अरावली को 'बचाने' नहीं, 'बेचने' की साजिश: CEC को 'कठपुतली' बनाने से लेकर सरिस्का का प्रोटेक्टेड एरिया बदलने की '48 घंटे की मंजूरी' तक, केंद्र सरकार की पोल खुली
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने केंद्र सरकार पर अरावली को खनन माफिया के हवाले करने की साजिश रचने का आरोप लगाया। CEC को कमजोर करने, सरिस्का के संरक्षित क्षेत्र की सीमा बदलने की जल्दबाजी और भ्रष्टाचार की शिकायतों के आधार पर उन्होंने भूपेंद्र यादव के दावों को भ्रामक बताया।
2002 में पर्यावरण संरक्षण के लिए बनी केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) को 5 सितंबर 2023 को सुप्रीम कोर्ट से हटाकर सरकार के अंदर लाते ही शक्तिविहीन किया।भूपेन्द्र यादव आज अरावली का प्रोटेक्टेड एरिया समझा रहे हैं, वे स्वयं जून 2025 में सरिस्का के प्रोटेक्टेड एरिया को बदलकर 50 खानें शुरू करना चाहते थे।
जयपुर, 22 दिसंबर 2025: पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने केंद्र सरकार द्वारा अरावली की परिभाषा बदलने और केंद्रीय मंत्री भूपेन्द्र यादव के उस दावे को पूरी तरह भ्रामक और तथ्यों से परे बताया है, जिसमें उन्होंने कहा है कि अरावली के केवल 0.19% हिस्से पर ही माइनिंग हो सकती है। वर्ष 2025 में ही केंद्र व राज्य सरकार द्वारा सरिस्का के संरक्षित क्षेत्र (प्रोटेक्टेड एरिया) में बदलाव के प्रयास को लेकर उनकी मंशा पर भी सवाल उठाया।
अशोक गहलोत ने कहा कि भाजपा जनता को आंकड़ों में उलझाकर बरगलाने का प्रयास कर रही है। अरावली की '100 मीटर' वाली नई परिभाषा को अकेले नहीं, बल्कि दो अन्य बड़े फैसलों के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए, जो यह साबित करते हैं कि यह पर्यावरण संरक्षण नहीं, बल्कि संस्थाओं पर कब्जा (इंस्टीट्यूशनल कैप्चर) कर अरावली को खनन माफिया को देने की तैयारी है।
1. रक्षक को भक्षक बनाने का 'संयोग' अशोक गहलोत ने कहा कि केंद्र सरकार ने 5 सितंबर 2023 को एक नोटिफिकेशन जारी कर 2002 में पर्यावरण संरक्षण के लिए बनी सुप्रीम कोर्ट की निगरानी वाली केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) को एक सुनियोजित साजिश के तहत कमजोर कर उसे पर्यावरण मंत्रालय के अधीन कर दिया है। 2002 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित यह 'तदर्थ' कमिटी अब सरकार के नोटिफिकेशन से 'स्थायी' सरकारी कमिटी बन गई है। पहले CEC के सदस्य सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी से नियुक्त होते थे, लेकिन इस नोटिफिकेशन के बाद सदस्यों को चुनने का पूरा अधिकार केंद्र सरकार ने अपने हाथ में ले लिया जिससे CEC केंद्र सरकार के इशारे पर काम करने लगी।
यह वही CEC है जिसकी निष्पक्ष रिपोर्ट के आधार पर 5 सितंबर 2011 को कर्नाटक की भाजपा सरकार के ताकतवर मंत्री जनार्दन रेड्डी को CBI ने अवैध खनन के मामले में गिरफ्तार किया था। ठीक 12 साल बाद, 5 सितंबर 2023 को केंद्र सरकार ने एक नोटिफिकेशन निकालकर पर्यावरण की रक्षा करने वाली उस 'सजग प्रहरी' (Watchdog) का गला घोंट दिया और उसे अपनी 'कठपुतली' बना लिया। आज CEC का काम केवल सरकारी फैसलों पर मुहर लगाना रह गया है।
अशोक गहलोत ने सवाल उठाया कि क्या सरकार को डर था कि अगर CEC स्वतंत्र रही, तो अरावली और सरिस्का जैसे संरक्षित क्षेत्रों में खनन की अनुमति नहीं मिलेगी? इस फैसले से पर्यावरण संरक्षण की पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गए हैं, क्योंकि पहले CEC एक स्वतंत्र निकाय के रूप में कार्य करती थी, जो सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में रहकर पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर निष्पक्ष सिफारिशें देती थी। अब इसका सरकारीकरण होने से यह मंत्रालय की इच्छा के अनुसार काम करेगी, जो पर्यावरण की बजाय आर्थिक हितों को प्राथमिकता दे सकता है। यह बदलाव न केवल अरावली जैसे क्षेत्रों को प्रभावित करेगा, बल्कि पूरे देश में वन और संरक्षित क्षेत्रों की सुरक्षा पर असर डालेगा।
2. संरक्षित क्षेत्र बदलाव का सरिस्का मॉडल केंद्रीय मंत्री भूपेन्द्र यादव का यह दावा कि इस नए फैसले के बाद भी अरावली के केवल 0.19% हिस्से पर ही नई माइनिंग हो सकती है क्योंकि बाकी जगह टाइगर सेंचुरी, प्रोटेक्टेड एरिया आदि हैं, अपूर्ण है। संरक्षित क्षेत्र में खनन के प्रयास की सरकार की मंशा का सबसे बड़ा उदाहरण सरिस्का के क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट (CTH) में बदलाव का प्रयास है।
राजस्थान सरकार ने सरिस्का के लिए 881 वर्ग किमी इलाके को क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट (CTH) घोषित किया जिससे इस एरिया के 1 किलोमीटर में खनन प्रतिबंधित है। इसी वर्ष 2025 में राजस्थान की भाजपा सरकार ने सरिस्का के CTH की बाउंड्री बदलने (Rationalisation) का प्रस्ताव तैयार किया गया था। तर्क दिया गया कि 'जमीन की अदला-बदली' होगी, लेकिन असल मकसद इस बदलाव से उन 50 से अधिक मार्बल और डोलोमाइट खदानों को जीवनदान मिलता CTH से 1 किमी की दूरी के कारण बंद हो गई थीं। सीमा पीछे हटने से ये खदानें प्रतिबंधित क्षेत्र से बाहर आ जाती।
इस फैसले को करने के लिए राजस्थान व केंद्र सरकार की हड़बड़ी और 'मैच फिक्सिंग' देखिए:नेशनल वाइल्डलाइफ बोर्ड की मीटिंग जो 11 जून 2025 को होनी थी, उसे जानबूझकर 26 जून तक टाला गया ताकि राजस्थान सरकार को प्रस्ताव तैयार करने का समय मिल सके।इसके बाद फाइलों को 'रॉकेट की रफ्तार' से दौड़ाया गया:➡️ 24 जून 2025: राजस्थान स्टेट वाइल्डलाइफ बोर्ड ने प्रस्ताव पास किया।➡️ 25 जून 2025: NTCA (नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी) ने मंजूरी दी।➡️ 26 जून 2025: केंद्रीय कमिटी (SC-NBWL) ने मुहर लगा दी।
अशोक गहलोत ने याद दिलाया कि 6 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी फटकार लगाते हुए इस फैसले पर रोक लगा दी थी। कोर्ट ने पूछा था कि "जो काम महीनों में होता है, वह 48 घंटे में कैसे हो गया?" कोर्ट की यह टिप्पणी ही सरकार की मंशा पर सबसे बड़ा सबूत है। आज भी केंद्र व राज्य सरकार दोनों मिलकर CTH की सीमा बदलने पर काम कर रही हैं। इस घटनाक्रम से साफ है कि सरकारी तंत्र का उपयोग पर्यावरण नियमों को तोड़-मरोड़कर खनन गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा है, जो न केवल बाघों और अन्य वन्यजीवों के आवास को खतरे में डालता है, बल्कि क्षेत्र की पारिस्थितिकी को भी बिगाड़ सकता है। सरिस्का जैसे क्षेत्र, जो राजस्थान की जैव विविधता का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, अब व्यावसायिक हितों के आगे कमजोर पड़ रहे हैं।
3. पीएमओ तक पहुंची भ्रष्टाचार की शिकायत अशोक गहलोत ने 'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट का हवाला देते हुए गंभीर आरोप लगाए। रिपोर्ट के अनुसार, थानागाजी के एक खदान मालिक के.एस. राठौड़ ने 14 जून को प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) को शिकायत भेजी थी कि खदानें फिर से चालू करवाने के लिए मालिकों से "पैसा इकट्ठा" करने को कहा जा रहा है।वहीं, CEC के एक सदस्य ने इसी रिपोर्ट में नाम न छापने की शर्त पर कहा कि "हम सुप्रीम कोर्ट की डेडलाइन से पहले इसे पूरा करना चाहते हैं क्योंकि मंत्री भूपेन्द्र यादव व्यक्तिगत रूप से इसकी निगरानी कर रहे हैं।" यह बयान साबित करता है कि CEC अब सुप्रीम कोर्ट की नहीं, बल्कि मंत्री की इच्छा पूरी करने में लगी है।अब केंद्रीय मंत्री भूपेन्द्र यादव बताएं कि उनकी 0.19% नई माइनिंग की परिभाषा पर भरोसा कौन करेगा क्योंकि ये दोनों उदाहरण बताते हैं कि केंद्र और राजस्थान की भाजपा सरकार की मंशा संरक्षित क्षेत्रों (Protected Areas) में भी सेंध लगाने की है। पहले अरावली की परिभाषा बदली गई, अब सरिस्का के प्रोटेक्टेड एरिया की भी बाउंड्री बदलने की कोशिश हो रही है। राजस्थान अपनी प्राकृतिक धरोहर के साथ यह खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं करेगा।
इस पूरे प्रकरण से पर्यावरण संरक्षण की नीतियों में पारदर्शिता की कमी उजागर होती है, जहां सरकारी फैसले जल्दबाजी में लिए जा रहे हैं और स्वतंत्र संस्थाओं को कमजोर किया जा रहा है। अरावली पर्वतमाला, जो राजस्थान की जलवायु और जल संसाधनों के लिए महत्वपूर्ण है, अब खनन के दबाव में आ सकती है, जिससे स्थानीय समुदायों और वन्यजीवों पर लंबे समय तक प्रभाव पड़ेगा। यह साजिश न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचाएगी, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े करेगी।