राजस्थान विधानसभा में गूंजा ‘बंदरों का आतंक’ मुद्दा शहरों की ओर पलायन, जिम्मेदारी तय करने और स्थायी समाधान पर हुई गंभीर चर्चा..

राजस्थान विधानसभा में बढ़ती बंदर समस्या को लेकर गंभीर चर्चा हुई। शाहपुरा विधायक मनीष यादव द्वारा मुद्दा उठाए जाने पर स्वायत्त शासन मंत्री झाबर सिंह खरा ने बताया कि जंगलों में मानवीय हस्तक्षेप, भोजन की कमी और बढ़ती आबादी के कारण बंदर शहरों की ओर आ रहे हैं। सरकार ने माना कि बंदरों को पकड़कर जंगल में छोड़ना स्थायी समाधान नहीं है। जिला कलेक्टरों को समस्या समाधान की जिम्मेदारी दी गई है और जयपुर के अटल वन में पुनर्वास सहित कई उपाय किए जा रहे हैं।

Feb 23, 2026 - 17:11
राजस्थान विधानसभा में गूंजा ‘बंदरों का आतंक’ मुद्दा  शहरों की ओर पलायन, जिम्मेदारी तय करने और स्थायी समाधान पर हुई गंभीर चर्चा..

राजस्थान के शहरी और ग्रामीण इलाकों में बंदरों की बढ़ती संख्या अब आम लोगों के लिए बड़ी परेशानी बनती जा रही है। घरों में घुसकर नुकसान पहुंचाने, लोगों पर हमला करने और सार्वजनिक स्थानों पर उपद्रव जैसी घटनाओं के कारण यह मुद्दा विधानसभा तक पहुंचा। शाहपुरा क्षेत्र के विधायक मनीष यादव ने सदन में यह मामला उठाते हुए सरकार से ठोस समाधान की मांग की।

मंत्री का जवाब इंसानी दखल और पर्यावरणीय बदलाव मुख्य कारण

स्वायत्त शासन मंत्री झाबर सिंह खरा ने सदन में विस्तार से जवाब देते हुए बताया कि बंदरों का शहरों की ओर आना अचानक नहीं हुआ, बल्कि इसके पीछे पर्यावरण और मानव गतिविधियों से जुड़े कई कारण हैं।

उन्होंने कहा कि जंगलों में बढ़ती मानवीय गतिविधियां, प्राकृतिक आवासों में कमी और भोजन की समस्या के कारण बंदर सुरक्षित स्थान और भोजन की तलाश में आबादी वाले इलाकों की ओर आने लगे हैं।

पुराने समय से बदली तस्वीर

मंत्री ने चर्चा के दौरान सामाजिक बदलाव का उदाहरण देते हुए बताया कि पहले बंदर गांव-कस्बों में कम दिखाई देते थे और लोग उन्हें देखने के लिए मदारी के कार्यक्रमों का इंतजार करते थे। लेकिन अब हालात उलट गए हैं और कई इलाकों में बंदरों की मौजूदगी आम जीवन के लिए चुनौती बन गई है।

धार्मिक स्थलों से शहरों तक का सफर

सरकार के अनुसार जयपुर और आसपास के कई धार्मिक व वन क्षेत्रों में बंदरों की बड़ी आबादी रहती थी। इनमें प्रमुख स्थान शामिल हैं:

गलता जी मंदिर

वीर हनुमान मंदिर सामोद

सरिस्का टाइगर रिजर्व

रणथंभौर गणेश मंदिर

पहले श्रद्धालु इन स्थानों पर बंदरों को भोजन कराते थे, जिससे उनका गुजारा हो जाता था। लेकिन समय के साथ बंदरों की संख्या तेजी से बढ़ी, जबकि भोजन की उपलब्धता उसी अनुपात में नहीं बढ़ी। इससे वे आबादी वाले क्षेत्रों में पहुंचने लगे।

शाहपुरा क्षेत्र के आंकड़े: खर्च हुआ, समस्या कायम

सदन में रखे गए आंकड़ों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में बड़ी संख्या में बंदरों को पकड़कर जंगलों में छोड़ा गया, जिस पर लाखों रुपये खर्च किए गए।

सरकार ने माना कि पकड़कर दूसरे स्थान पर छोड़ने की व्यवस्था स्थायी समाधान साबित नहीं हो रही, क्योंकि कई बार बंदर दोबारा आबादी वाले क्षेत्रों में लौट आते हैं।

विभागों के बीच जिम्मेदारी को लेकर भ्रम

चर्चा के दौरान यह भी सामने आया कि बंदरों की समस्या के समाधान को लेकर विभागों में स्पष्ट जिम्मेदारी तय नहीं है।

वन विभाग इसे वन्यजीव का मामला मानता है

स्थानीय निकाय और पंचायत संस्थाएं इसे वन विभाग का विषय बताती हैं

मंत्री ने स्पष्ट किया कि सरकारी अधिसूचना के अनुसार जिला कलेक्टरों को इस विषय में अधिकृत अधिकारी बनाया गया है और अब स्थानीय स्तर पर कार्रवाई सुनिश्चित करना उनकी जिम्मेदारी होगी।

पुनर्वास की नई कोशिशें

जयपुर के अटल वन (संजय वन) में बंदरों के पुनर्वास के लिए विशेष व्यवस्थाएं की जा रही हैं।

क्षेत्र की सुरक्षा के लिए ऊंची दीवार और सोलर फेंसिंग

वन क्षेत्र में फलदार पौधों का विकास

लोगों द्वारा अनियंत्रित भोजन डालने पर निगरानी

इन उपायों का उद्देश्य बंदरों को प्राकृतिक वातावरण में रोकना है ताकि वे शहरों की ओर न आएं।

विधायकों से मांगे सुझाव, स्थायी समाधान की तलाश

सरकार ने माना कि समस्या व्यापक है और इसका तुरंत पूर्ण समाधान संभव नहीं है। इसलिए सभी जनप्रतिनिधियों से लिखित सुझाव मांगे गए हैं।

सरकार का मानना है कि नियमित पकड़-धकड़ अभियान, प्राकृतिक आवास में भोजन की व्यवस्था और स्थानीय प्रशासन की सक्रिय भूमिका से समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

विधानसभा में हुई चर्चा से साफ हुआ कि बंदरों का बढ़ता आतंक केवल वन्यजीव या नगर निकाय का मुद्दा नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन, शहरी विस्तार और प्रशासनिक समन्वय से जुड़ी जटिल चुनौती है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि सुझाए गए उपाय जमीन पर कितने प्रभावी साबित होते हैं।