“मंच पर अचानक बदला पूरा समीकरण… ‘मेरी बहन’ कहने के बाद भी नहीं मानीं नेत्री, क्या हुआ अंदर? जानिए पूरा मामला”

एक राजनीतिक कार्यक्रम में अचानक ऐसा क्या हुआ कि मंच से लोग हटाए गए, नाराजगी खुलकर सामने आई और बात सख्ती तक पहुंच गई… जानिए इस पूरे घटनाक्रम की अंदर की कहानी।

Apr 8, 2026 - 15:31
“मंच पर अचानक बदला पूरा समीकरण… ‘मेरी बहन’ कहने के बाद भी नहीं मानीं नेत्री, क्या हुआ अंदर? जानिए पूरा मामला”

एक राजनीतिक कार्यक्रम उस समय चर्चा का केंद्र बन गया, जब मंच पर अचानक माहौल बदल गया और सबके सामने ऐसा घटनाक्रम हुआ, जिसने सभी को चौंका दिया।

कार्यक्रम के दौरान वरिष्ठ नेता वसुंधरा राजे ने नारी शक्ति को प्राथमिकता देने की बात करते हुए मंच पर बैठे पुरुष पदाधिकारियों को नीचे बैठने के निर्देश दिए और उनकी जगह महिला कार्यकर्ताओं को मंच पर बुलाया। उनका यह कदम कार्यक्रम के उद्देश्य—नारी सशक्तिकरण—को दर्शाने के लिए था, लेकिन इसी दौरान एक अप्रत्याशित स्थिति बन गई।

मंच पर जगह नहीं मिलने से भाजपा महिला मोर्चा की जिलाध्यक्ष शीतल भंडारी नाराज हो गईं। उन्होंने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि अगर उन्हें मंच पर जगह नहीं मिलती, तो वे नीचे ही बैठ जाएंगी। इसके बाद वह सचमुच मंच के सामने कार्यकर्ताओं के साथ जमीन पर बैठ गईं, जिससे माहौल अचानक गंभीर हो गया।

स्थिति को संभालने के लिए वसुंधरा राजे ने उन्हें कई बार “मेरी बहन” कहकर मंच पर आने के लिए बुलाया, लेकिन शीतल भंडारी अपनी बात पर अड़ी रहीं और मंच पर जाने से इनकार कर दिया। यह दृश्य कार्यक्रम में मौजूद सभी लोगों के लिए हैरान करने वाला था।

जब काफी देर तक बात नहीं बनी, तो वसुंधरा राजे ने सख्त लहजे में हस्तक्षेप करते हुए कहा कि वे यहां मुश्किल से पहुंची हैं और अब इस मुद्दे पर और बहस नहीं होगी। उनके इस रुख के बाद आखिरकार शीतल भंडारी जमीन से उठकर कुर्सी पर बैठ गईं और मामला शांत हुआ।

हालांकि, कार्यक्रम के समापन के बाद शीतल भंडारी ने कहा कि उन्हें किसी से कोई नाराजगी नहीं है और पार्टी उनके लिए मां के समान है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि वसुंधरा राजे का आज भी कार्यकर्ताओं के बीच खास प्रभाव और क्रेज बना हुआ है।

वहीं, इस कार्यक्रम में एक और नाराजगी सामने आई, जब भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेश प्रवक्ता निर्मला मकवाना बीच में ही कार्यक्रम छोड़कर चली गईं। उन्होंने आरोप लगाया कि संगठन में जिम्मेदारी होने के बावजूद उन्हें मंच पर उचित स्थान नहीं दिया गया और स्वागत सूची में भी उनका नाम शामिल नहीं किया गया।

यह पूरा घटनाक्रम न केवल संगठनात्मक व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि राजनीतिक मंचों पर सम्मान और प्रतिनिधित्व का मुद्दा कितना संवेदनशील हो सकता है।

Kashish Sain Bringing truth from the ground