जहां कभी कैद थे स्वतंत्रता सेनानी, वहां अब बने टॉयलेट! 200 साल पुराने कुंभलगढ़ दुर्ग का सच जानकर चौंक जाएंगे आप!

क्या विश्व धरोहर कुंभलगढ़ में इतिहास के साथ बड़ा समझौता हुआ? जहां कभी स्वतंत्रता सेनानी नजरबंद थे, वहां आज दिखा कुछ ऐसा कि लोग सवाल उठाने लगे।

May 14, 2026 - 11:07
जहां कभी कैद थे स्वतंत्रता सेनानी, वहां अब बने टॉयलेट! 200 साल पुराने कुंभलगढ़ दुर्ग का सच जानकर चौंक जाएंगे आप!

कुंभलगढ़ दुर्ग में इतिहास बनाम सुविधा की बहस तेज

राजसमंद जिले के विश्व प्रसिद्ध कुंभलगढ़ दुर्ग में इतिहास संरक्षण को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने पर्यटकों, इतिहासकारों और स्थानीय लोगों को चौंका दिया है। विश्व धरोहर माने जाने वाले इस ऐतिहासिक दुर्ग की तलहटी में स्थित करीब 200 वर्ष पुरानी रियासतकालीन जेल की बैरकों को अब महिला और पुरुष शौचालय में बदल दिया गया है।

जिस स्थान पर कभी कैदियों और स्वतंत्रता सेनानियों को नजरबंद रखा जाता था, वहां आज टाइल्स, फ्लश और आधुनिक सुविधाएं दिखाई दे रही हैं। यही वजह है कि यह मामला अब “संरक्षण बनाम सुविधा” की बहस का केंद्र बन गया है।

सुविधा के नाम पर बदली गई बैरकों की पहचान

जानकारी के अनुसार, जेल परिसर में लगभग 10 बैरकें मौजूद हैं। इनमें से चार बैरकों को भारतीय पुरातत्व विभाग ने वर्षों पहले पर्यटकों की सुविधा के नाम पर शौचालय में तब्दील कर दिया। बाकी कमरों में पुलिस चौकी और कर्मचारियों के निवास संचालित किए जा रहे हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि ऐतिहासिक महत्व रखने वाले इस परिसर को धीरे-धीरे उसके मूल स्वरूप से दूर किया जा रहा है। अब स्थिति यह है कि पर्यटक वहां मौजूद ऐतिहासिक जेल को पहचान भी नहीं पाते।

दुर्ग में कार्यरत कर्मचारियों के मुताबिक, पहले परिसर के दूसरे हिस्से में शौचालय बनाए गए थे, लेकिन बाद में उस स्थान को बेबी केयर रूम में बदल दिया गया। इसके बाद पुरानी जेल की बैरकों का उपयोग शौचालय के रूप में शुरू कर दिया गया।

लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब परिसर में अन्य स्थान उपलब्ध थे, तो ऐतिहासिक बैरकों को ही क्यों चुना गया? कई लोगों ने तंज कसते हुए कहा कि “शायद विभाग को लगा होगा कि अब कैदियों की जगह सुविधाओं को बंद कर दिया जाए।”

स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा रहा यह परिसर

इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के अनुसार, यह जेल केवल रियासतकालीन अपराधियों तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसका संबंध स्वतंत्रता आंदोलन से भी रहा है।

मेवाड़ के स्वतंत्रता सेनानियों पर शोध करने वाले दिनेश श्रीमाली बताते हैं कि वर्ष 1931 में नाथद्वारा के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी माणिक्यलाल वर्मा को अंग्रेजों ने कुंभलगढ़ में नजरबंद किया था। अंग्रेजों का उद्देश्य उनकी गतिविधियों पर नियंत्रण रखना और आंदोलन को कमजोर करना था।

इसके बाद वर्ष 1938 में प्रोफेसर नारायणदास बागोरा के नेतृत्व में राजसमंद और नाथद्वारा के 16 स्वतंत्रता सेनानियों को भी इसी परिसर में रखा गया था। इतिहासकारों के मुताबिक, स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कई बार अंग्रेजों ने आंदोलनकारियों को नजरबंद करने के लिए कुंभलगढ़ को चुना।

आखिर कुंभलगढ़ ही क्यों था अंग्रेजों की पसंद?

अरावली की ऊंची पहाड़ियों पर स्थित कुंभलगढ़ दुर्ग रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता था। यहां से मेवाड़ और मारवाड़ दोनों क्षेत्रों पर नजर रखी जा सकती थी।

उस दौर में यह इलाका इतना दुर्गम था कि यहां तक पहुंचना आसान नहीं माना जाता था। यही वजह थी कि राजनीतिक बंदियों और खतरनाक अपराधियों को यहां रखा जाता था।

कुंभलगढ़ किले की विशाल दीवार, जिसे चीन की दीवार के बाद दुनिया की दूसरी सबसे लंबी दीवार माना जाता है, इसकी सुरक्षा को और मजबूत बनाती थी।

खूंखार अपराधियों से लेकर राजनीतिक बंदियों तक का ठिकाना

इतिहासकार बताते हैं कि मेवाड़ स्टेट के शासनकाल में कई खूंखार अपराधियों को भी इसी जेल में रखा जाता था। बाद में ब्रिटिश शासन के दौरान यहां राजनीतिक बंदियों और स्वतंत्रता सेनानियों को खुली जेल के रूप में नजरबंद किया जाने लगा।

ब्रिटिश जेल मैन्युअल के अनुसार, बंदियों को वहां केवल नमक और रोटी दी जाती थी। कठिन परिस्थितियों में रहने के बावजूद स्वतंत्रता सेनानियों ने आंदोलन की भावना को कमजोर नहीं होने दिया।

विभागीय कर्मचारियों ने भी मानी बात

नाम नहीं छापने की शर्त पर विभागीय कर्मचारियों ने स्वीकार किया कि वर्तमान में जिन कमरों में शौचालय संचालित हो रहे हैं, वे वास्तव में रियासतकालीन जेल की बैरकें थीं। हालांकि, आधिकारिक स्तर पर कोई भी कर्मचारी खुलकर बयान देने से बचता नजर आया।

संरक्षण पर उठ रहे सवाल

इस पूरे मामले ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण केवल नाम तक सीमित रह गया है?

स्थानीय लोगों और इतिहास प्रेमियों का कहना है कि यदि समय रहते ऐसे स्थलों की मूल पहचान को सुरक्षित नहीं रखा गया, तो आने वाली पीढ़ियां इतिहास को केवल किताबों में पढ़ेंगी, वास्तविक स्वरूप में देख नहीं पाएंगी।

कुंभलगढ़ जैसे विश्व धरोहर स्थल पर इस तरह का बदलाव अब प्रशासन और पुरातत्व विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर रहा है।

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