अरावली को बचाने की मुहिम तेज: कोटा में पर्यावरण प्रेमियों की बैठक, बड़ा आंदोलन की चेतावनी

कोटा में पर्यावरण प्रेमी सुप्रीम कोर्ट के अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा के खिलाफ एकजुट हुए हैं। हाड़ौती पर्यावरण संरक्षण समिति और चंबल बचाओ अभियान के बैनर तले किशोर सागर तालाब पर हुई बैठक में कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी कि अरावली के साथ छेड़छाड़ हुई तो बड़ा आंदोलन होगा। उनका आरोप है कि यह फैसला उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने और खनन के लिए रास्ता खोलने का है, जिससे राजस्थान रेगिस्तान बन जाएगा।

Dec 23, 2025 - 15:21
Dec 23, 2025 - 15:22
अरावली को बचाने की मुहिम तेज: कोटा में पर्यावरण प्रेमियों की बैठक, बड़ा आंदोलन की चेतावनी

राजस्थान में अरावली पर्वत श्रृंखला को बचाने का आंदोलन अब हाड़ौती क्षेत्र तक पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले (20 नवंबर 2025) से चिंतित पर्यावरण प्रेमी कोटा में एकजुट हो रहे हैं। इस फैसले में अरावली पहाड़ियों की परिभाषा को बदलकर केवल उन भूमि रूपों को शामिल किया गया है जो स्थानीय स्तर से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाले हैं। इससे अरावली के बड़े हिस्से (लगभग 90% हिस्सा राजस्थान में) संरक्षण से बाहर हो सकते हैं, जिससे खनन और पर्यावरण विनाश की आशंका बढ़ गई है। हाड़ौती पर्यावरण संरक्षण समिति और चंबल बचाओ अभियान समिति के बैनर तले कोटा के किशोर सागर तालाब के पास बारादरी में पर्यावरण प्रेमियों की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। बैठक में किसान नेता दशरथ कुमार, श्याम मनोहर हरित, प्रमोद चतुर्वेदी, अरुण भार्गव, मंजूर तंवर, हेमंत झाला, महेंद्र गुर्जर सहित कई प्रमुख पर्यावरण कार्यकर्ता मौजूद रहे। सभी ने एक स्वर में कहा कि अरावली के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अगर सरकार या कोर्ट का फैसला पर्यावरण के खिलाफ रहा तो कोटा की धरती पर बड़ा आंदोलन होगा।

चंबल बचाओ अभियान के संयोजक कुंदन चीता ने बैठक में कहा, "हमने किशोर सागर तालाब पर पर्यावरण प्रेमियों के साथ आंदोलन की रणनीति पर चर्चा की। कोर्ट के फैसले से लगता है कि पूरी अरावली को उजाड़ दिया जाएगा। अरावली करीब 250 करोड़ साल पुरानी है – जब इंसान का अस्तित्व भी नहीं था, तब से यह प्राकृतिक रूप से संरक्षित है। इसे उजाड़ने का असर क्या होगा? यह सब बड़े उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए हो रहा है। सरकार उद्योगपतियों को जमीन देना चाहती है और पर्यावरण को नष्ट करना चाहती है। सरकार को अपना निर्णय वापस लेना होगा, और सुप्रीम कोर्ट को भी जनता की भावनाओं को समझना चाहिए। वरना राजस्थान रेगिस्तान में बदल जाएगा। जल्द ही हम संभागीय आयुक्त को ज्ञापन सौंपेंगे।"

हाड़ौती पर्यावरण संरक्षण समिति के श्याम मनोहर हरित ने कहा, "अरावली पर्वतमाला दक्षिण-पूर्वी राजस्थान के कोटा, बूंदी, बारां और झालावाड़ क्षेत्रों से जुड़ी हुई है। सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले से सभी पर्यावरणविद चिंतित हैं, क्योंकि इससे सरकार खनन के लिए अरावली को खोल सकती है। अरावली को राजस्थान की 'लाइफ लाइन' कहा जाता है। अगर इसे समाप्त किया गया तो पूरा राजस्थान रेगिस्तान बन जाएगा। हमारी मांग है कि अरावली का पूर्ण संरक्षण किया जाए। हमने सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति को याचिका भेजी है और फैसले को बदलने की अपील की है।"

पृष्ठभूमि: सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्यों विवादास्पद? सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय की कमेटी की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए अरावली की एकसमान परिभाषा तय की है। इसके तहत केवल 100 मीटर से ऊंची पहाड़ियां ही 'अरावली हिल्स' मानी जाएंगी। हालांकि कोर्ट ने नई खनन लीज पर रोक लगा दी है और सस्टेनेबल माइनिंग प्लान तैयार होने तक कोई नई माइनिंग नहीं होगी, लेकिन पर्यावरणविदों का कहना है कि इससे निचली पहाड़ियां (जो जैव विविधता और भूजल रिचार्ज में महत्वपूर्ण हैं) असुरक्षित हो जाएंगी। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के डेटा के अनुसार, राजस्थान में 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 ही इस मानक पर खरी उतरती हैं।अरावली थार मरुस्थल के फैलाव को रोकती है, भूजल स्तर बनाए रखती है और दिल्ली-एनसीआर सहित उत्तर भारत की जलवायु को प्रभावित करती है। इसे नष्ट करने से रेगिस्तानकरण तेज होगा, पानी की कमी बढ़ेगी और जैव विविधता खत्म हो जाएगी

कोटा में बैठक का स्थान: किशोर सागर तालाब के किनारे हुई, जो कोटा की ऐतिहासिक और प्राकृतिक सुंदरता का प्रतीक है।

Mohit Parihar Mohit Parihar is a journalist at The Khatak, covering politics and public issues with a strong focus on ground reporting and factual storytelling.