"ये कैसा जीवन भगवान" दुर्लभ बीमारी ने छीनी बचपन की खुशियां 12 साल से दर्द सह रहा बाड़मेर का बच्चा...
बाड़मेर जिले के जालिपा गांव का 12 वर्षीय बच्चा जन्म के तीन दिन बाद से दुर्लभ बीमारी एपिडर्मोलाइसिस बुलोसा से पीड़ित है। इस बीमारी के कारण उसकी त्वचा बेहद नाजुक हो गई है और हल्की रगड़ से भी घाव, फफोले, खून और मवाद निकलने लगता है। इलाज की तलाश में परिवार कई शहरों के अस्पतालों के चक्कर लगा चुका है और पूरी जमा पूंजी खर्च कर चुका है, लेकिन स्थायी इलाज नहीं मिल पाया। अब परिवार प्रशासन से आर्थिक सहायता और बेहतर उपचार की मांग कर रहा है।
बाड़मेर। राजस्थान के बाड़मेर जिले के जालिपा गांव से एक ऐसी मार्मिक कहानी सामने आई है, जिसने हर किसी को झकझोर दिया है। यहां रहने वाला 12 वर्षीय ओमप्रकाश जन्म के सिर्फ तीन दिन बाद से एक दुर्लभ और बेहद पीड़ादायक बीमारी से जूझ रहा है। हालत ऐसी है कि शरीर पर हल्की हवा या मामूली रगड़ भी उसकी त्वचा को फाड़ देती है और फफोले, खून व मवाद निकलने लगता है।
जन्म के तीन दिन बाद शुरू हुआ दर्द का सिलसिला
परिवार के अनुसार बच्चे के जन्म के बाद शुरुआती तीन दिन सब सामान्य थे, लेकिन अचानक उसके शरीर पर फफोले उभरने लगे। घबराए परिजन उसे अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां प्राथमिक इलाज तो मिला, लेकिन बीमारी डॉक्टरों की समझ से परे थी। इसके बाद परिवार इलाज की उम्मीद में बाड़मेर से जोधपुर, अहमदाबाद और मुंबई तक कई अस्पतालों के चक्कर लगाता रहा, मगर स्थायी इलाज नहीं मिल सका।
दुर्लभ बीमारी ‘एपिडर्मोलाइसिस बुलोसा’ से पीड़ित
डॉक्टरों ने जांच के बाद बच्चे को एपिडर्मोलाइसिस बुलोसा नामक दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी से पीड़ित बताया। इस बीमारी में त्वचा बेहद नाजुक हो जाती है और हल्की रगड़ या दबाव से भी छाले बन जाते हैं। समय के साथ घाव गंभीर रूप ले लेते हैं और संक्रमण का खतरा बना रहता है। बीमारी का स्थायी इलाज फिलहाल उपलब्ध नहीं माना जाता, केवल देखभाल और लक्षणों के आधार पर उपचार किया जाता है।
हर दिन नई पीड़ा, अंगुलियां तक झड़ गईं
बीमारी की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि धीरे-धीरे बच्चे के हाथ-पैरों की कई अंगुलियां खराब होकर गिर चुकी हैं। शरीर का बड़ा हिस्सा फफोलों और घावों से प्रभावित है। परिवार को उसे कपड़े पहनाने, उठाने-बैठाने और यहां तक कि हवा से बचाने तक में विशेष सावधानी बरतनी पड़ती है, क्योंकि छोटी-सी गलती भी असहनीय दर्द दे देती है।
दादा बना सहारा, इलाज के लिए दर-दर भटका परिवार
बच्चे के दादा पुरखाराम पिछले 12 वर्षों से अपने पोते को कंधे पर उठाकर अस्पताल-अस्पताल घूम रहे हैं। उन्होंने इलाज के लिए अपनी पूरी जमा पूंजी खर्च कर दी। परिवार ने चिकित्सा उपचार के साथ-साथ धार्मिक और पारंपरिक उपायों का भी सहारा लिया, लेकिन राहत नहीं मिली।
मुफ्त इलाज के नाम पर भारी बिल का आरोप
परिजनों का आरोप है कि एक निजी अस्पताल ने मुफ्त इलाज का भरोसा दिया, लेकिन बाद में प्लास्टिक सर्जरी और उपचार के नाम पर लाखों रुपये का बिल थमा दिया। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार को इसके लिए कर्ज तक लेना पड़ा।
आयुष्मान योजना का लाभ नहीं मिला
परिवार के पास आयुष्मान भारत योजना का कार्ड होने के बावजूद उन्हें अपेक्षित राहत नहीं मिल पाई। अब दादा ने जिला प्रशासन से मिलकर आर्थिक मदद और उचित इलाज की व्यवस्था की मांग की है।
इलाज से ज्यादा जरूरी विशेष देखभाल
चिकित्सकों के अनुसार इस बीमारी में मरीज को संक्रमण से बचाना, घावों की नियमित ड्रेसिंग, विशेष पोषण और सावधानीपूर्ण जीवनशैली ही सबसे बड़ा सहारा होती है। लंबे समय तक लगातार देखभाल ही दर्द को कुछ हद तक कम कर सकती है।
यह कहानी सिर्फ एक बच्चे की बीमारी नहीं, बल्कि ग्रामीण परिवारों की उस मजबूरी को भी दिखाती है, जहां दुर्लभ बीमारियों के इलाज, जागरूकता और आर्थिक सहायता की कमी आज भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।