मां की हत्या, पिता कोमा में: फिर भी नहीं छोड़ी पढ़ाई – ऊषा सोलंकी ने जीवन समर्पित कर दिया बच्चों की शिक्षा और महिला सशक्तिकरण को
भरतपुर की ऊषा सोलंकी ने बचपन में परिवार पर हुए हमले में मां, दादी और चाची को खो दिया, पिता कोमा में रहे, लेकिन पढ़ाई नहीं छोड़ी। MBA और MSW करने के बाद उन्होंने 50+ सरकारी स्कूलों और 62 आंगनवाड़ी केंद्रों में टॉयलेट-पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं सुधारने, बच्चों की शिक्षा और महिलाओं के रोजगार के लिए काम शुरू किया। उनकी संस्था 'दरख्त छांव फाउंडेशन' और 'मावली कॉउचर' के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बना रही हैं। शिल्पा शेट्टी ने भी उनके काम की सराहना कर आर्थिक मदद की। यह महिला दिवस पर एक प्रेरणादायक संघर्ष की कहानी है।
भरतपुर, राजस्थान की 35 वर्षीय ऊषा सोलंकी एक ऐसी महिला हैं, जिनकी जिंदगी संघर्षों की मिसाल है। बचपन में परिवार पर हुए क्रूर हमलों ने उन्हें मां, दादी और चाची से हमेशा के लिए छीन लिया, पिता लंबे समय तक कोमा में रहे, लेकिन इन दर्दनाक घटनाओं के बावजूद ऊषा ने पढ़ाई नहीं छोड़ी। आज वे शिक्षा, स्वच्छता, स्वास्थ्य और महिला रोजगार के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला रही हैं। उनकी मेहनत की सराहना अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी ने भी की है, जिनके फाउंडेशन से आर्थिक सहयोग मिला। महिला दिवस के अवसर पर उनकी प्रेरणादायक कहानी को विस्तार से जानिए।
बचपन में शुरू हुआ दर्दनाक सफर
ऊषा सोलंकी का जन्म भरतपुर जिले के एक गांव में हुआ। उनकी जिंदगी में दुखों का सिलसिला बहुत छोटी उम्र से शुरू हो गया। साल 1993 में परिवार में हुए एक विवाद के कारण गांव के ही एक व्यक्ति ने उनके दादा की हत्या कर दी। यह घाव अभी ठीक भी नहीं हुआ था कि 1995 में एक और भयानक घटना घटी। घर में घुसकर कुछ लोगों ने ताबड़तोड़ फायरिंग की, जिसमें उनकी मां, दादी और चाची की मौत हो गई। पिता गंभीर रूप से घायल हो गए और लंबे समय तक कोमा में रहे। उस समय ऊषा सिर्फ 7 साल की थीं।
इस हमले के बाद परिवार में कुल 7 बच्चे (सगे-चचेरे भाई-बहन) एक छत के नीचे रहते थे। मां के साए के बिना सबके सामने भविष्य का बड़ा संकट खड़ा हो गया। आर्थिक तंगी के साथ-साथ भावनात्मक आघात भी था। सुरक्षा के लिहाज से बच्चों को घर में ही रहना पड़ता था, और स्कूलिंग भी घर से ही हुई।
बुआ बनीं परिवार की सहारा, ऊषा ने की उच्च शिक्षा
इतनी बड़ी त्रासदी के बाद बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी उनकी बुआ ने उठाई। बुआ उत्तर प्रदेश के एक गांव में शादीशुदा थीं, लेकिन लंबे समय तक भरतपुर रहकर बच्चों को सहारा दिया और उन्हें आगे बढ़ने की हिम्मत दी। जब बच्चे थोड़े बड़े हो गए, तब बुआ अपने ससुराल लौटीं।
ऊषा बताती हैं कि आर्थिक और भावनात्मक चुनौतियों के बीच भी उन्होंने पढ़ाई पर फोकस रखा। उन्होंने एमबीए (MBA) और एमएसडब्ल्यू (MSW) की डिग्री हासिल की। इसके बाद समाज सेवा के क्षेत्र में गहराई से जुड़कर सोशल वर्क में पीएचडी शुरू की। उनका मानना है कि शिक्षा सिर्फ डिग्री नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का सबसे मजबूत माध्यम है।
2010 से शुरू किया शिक्षा के लिए संघर्ष
साल 2010 से ऊषा ने ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों की शिक्षा पर सक्रिय काम शुरू किया। राजस्थान के कई सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी थी – साफ पानी नहीं, टॉयलेट की हालत खराब, जिसका सबसे ज्यादा असर लड़कियों की पढ़ाई पर पड़ता था। कई छात्राएं स्कूल छोड़ने को मजबूर हो जाती थीं।
इसी समस्या को देखते हुए ऊषा ने स्कूलों में टॉयलेट, स्वच्छ पेयजल और अन्य सुविधाओं को बेहतर बनाने की मुहिम छेड़ी। आज वे 50 से अधिक सरकारी स्कूलों और 62 आंगनवाड़ी केंद्रों से जुड़कर काम कर रही हैं। स्थानीय समुदाय, प्रशासन और विभिन्न संस्थाओं के साथ मिलकर वे बच्चों के लिए सुरक्षित और स्वच्छ वातावरण सुनिश्चित कर रही हैं। उनका कहना है, "बच्चों को पढ़ने के लिए अच्छा माहौल मिलेगा, तभी वे अपने सपनों को हकीकत में बदल पाएंगे।"
महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की पहल
बच्चों की शिक्षा के अलावा ऊषा महिलाओं के सशक्तिकरण पर भी फोकस कर रही हैं। ग्रामीण और दिव्यांग महिलाओं को रोजगार से जोड़ने के लिए उन्होंने "मावली कॉउचर" नाम की पहल शुरू की। इस संस्था के तहत महिलाओं को सिलाई और अन्य कौशलों का प्रशिक्षण दिया जाता है, ताकि वे स्वावलंबी बन सकें और अपने परिवार की आर्थिक मदद कर सकें।
अपने सामाजिक कार्यों को और संगठित रूप देने के लिए ऊषा ने "दरख्त छांव फाउंडेशन" (Darakht Chhanv Foundation) की स्थापना की। यह फाउंडेशन शिक्षा, स्वच्छता, स्वास्थ्य और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में काम कर रहा है। इसके माध्यम से सैकड़ों बच्चों और महिलाओं तक मदद पहुंचाई जा रही है। फाउंडेशन का मकसद है – प्यार और नेतृत्व से समाज को बेहतर बनाना।
शिल्पा शेट्टी ने की सराहना, मिला आर्थिक सहयोग
ऊषा के काम की चर्चा अब देश स्तर पर होने लगी है। अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी उनके प्रयासों से इतनी प्रभावित हुईं कि उनके फाउंडेशन से संपर्क किया गया। ऊषा बताती हैं कि एक दिन अचानक फोन आया, जिसमें खुद को शिल्पा शेट्टी के फाउंडेशन से बताया गया। शुरुआत में उन्हें यकीन नहीं हुआ, लेकिन बाद में विस्तार से बात हुई और उनके काम की जानकारी ली गई।शिल्पा शेट्टी की ओर से ऊषा के कार्यों के लिए आर्थिक सहयोग प्रदान किया गया। यह सहयोग उनके लिए सिर्फ मदद नहीं, बल्कि उनके संघर्ष और समर्पण की बड़ी मान्यता है। यह प्रेरणा उन्हें और आगे बढ़ने की ताकत देती है।