रणथम्भौर टाइगर रिजर्व में दिल दहला देने वाली घटना: लेपर्ड ने 7 साल के बच्चे को 10 मिनट तक गर्दन दबोचकर रखा, पिता के सामने झपट लिया
सवाई माधोपुर के रणथम्भौर टाइगर रिजर्व के बफर जोन में 7 साल के विक्रम बंजारा को लेपर्ड ने पिता के हाथ से झपट्टा मारकर ले गया। तेंदुए ने 10 मिनट तक बच्चे की गर्दन दबोचे रखी, जिससे गर्दन की हड्डी टूट गई और ज्यादा खून बहने से मौत हो गई। पिता रामजीलाल को जिंदगी भर अफसोस रहेगा कि बेटे को नहीं बचा पाए। 17 घंटे तक परिजनों ने शव उठाने से इनकार किया, अंत में 5 लाख मुआवजा व अन्य सुविधाओं पर सहमति बनी।
सवाई माधोपुर (राजस्थान) के विश्व प्रसिद्ध रणथम्भौर टाइगर रिजर्व के बफर जोन में गुरुवार (11 दिसंबर 2025) शाम को एक भयावह हादसा हुआ। आटीला बालाजी मंदिर के पास 7 साल के मासूम विक्रम बंजारा को एक लेपर्ड ने पिता के हाथ से झपट्टा मारकर जंगल में खींच ले गया। लेपर्ड ने बच्चे की गर्दन को अपने जबड़ों में जकड़ लिया और करीब 10 मिनट तक झाड़ियों में बैठा रहा। इस दौरान बच्चे की गर्दन की हड्डियां टूट गईं और अत्यधिक रक्तस्राव से उसकी मौत का कारण बना।
पिता के सामने हुआ हमला, हाथ पकड़े था बच्चा विक्रम के पिता रामजीलाल बंजारा ने आंसुओं भरी आंखों से बताया, “वो रोज मेरे साथ घर से 150 मीटर दूर आटीला बालाजी मंदिर जाता था। शाम को भी मैं उसे साथ ले गया था। उसने मेरा हाथ पकड़ रखा था। अचानक लेपर्ड झपट्टा मारा और विक्रम को झाड़ियों में घसीट ले गया। मैं चिल्लाता रहा, पीछे-पीछे दौड़ा, लेकिन कुछ कर नहीं पाया। जिंदगी भर ये अफसोस रहेगा कि अपने बेटे को बचा नहीं सका।”रामजीलाल ने बताया कि उनकी बंजारा बस्ती पिछले 45 साल से रिजर्व के बफर जोन में बसी हुई है। विक्रम का जन्म भी यहीं हुआ था। वह बहुत आज्ञाकारी बच्चा था और रोज शाम को पिता के साथ मंदिर में धूप-दीपक करने जाता था।
10 मिनट तक गर्दन दबोचे रखा लेपर्ड ने पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में सामने आया है कि:बच्चे के गले पर लेपर्ड के दांतों के गहरे निशान थे। गर्दन की हड्डियां पूरी तरह टूट चुकी थीं। मौत का मुख्य कारण अत्यधिक रक्तस्राव (excessive hemorrhage) और श्वास नली का पूरी तरह बंद हो जाना था। डॉक्टर्स ने बताया कि लेपर्ड ने बच्चे को तुरंत नहीं मारा, बल्कि गर्दन दबोचकर करीब 10 मिनट तक झाड़ियों में बैठा रहा। इसी दौरान बच्चे ने तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया।
सड़क पर बिखरा खून, परिजनों ने 17 घंटे तक शव उठाने से इनकार हमले के तुरंत बाद मौके पर पहुंची वन विभाग की टीम और स्थानीय लोगों ने देखा कि सड़क पर खून ही खून बिखरा पड़ा था। अन्य बच्चों ने बताया कि लेपर्ड जब विक्रम को घसीटकर ले जा रहा था, तब भी खून की बूंदें गिरती जा रही थीं।परिजनों ने गुस्से और दुख में शव उठाने से साफ मना कर दिया। उनका कहना था कि जब तक उचित मुआवजा और स्थायी सुरक्षा की गारंटी नहीं मिलेगी, शव नहीं उठाएंगे। करीब 17 घंटे चले गतिरोध के बाद शुक्रवार दोपहर निम्न सहमति बनी:तत्काल मुआवजा के रूप में 5 लाख रुपये परिवार के किसी एक आश्रित को वन विभाग में गाइड या वॉलंटियर के रूप में नौकरी (योग्यता अनुसार) मुख्यमंत्री आयुष्मान भारत योजना के तहत 5 लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा मुख्यमंत्री सहायता कोष से अधिकतम संभव राशि प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पक्का मकान इसके बाद ही परिजनों ने शव उठाने और अंतिम संस्कार की अनुमति दी।
वन विभाग की कार्रवाई आटीला बालाजी मंदिर के पास तुरंत पिंजरा (cage) लगाया गया लेपर्ड को पकड़ने के लिए विशेष टीम गठित पूरे इलाके में अलर्ट जारी, लोगों से सतर्क रहने की अपील बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष का यह एक और दर्दनाक उदाहरण है। रणथम्भौर जैसे संरक्षित क्षेत्रों के आसपास बसी बस्तियों में बच्चों और महिलाओं पर हमले लगातार बढ़ रहे हैं। परिजनों का गुस्सा और दुख जायज है कि इतने सालों से रहते आ रहे हैं, लेकिन आज तक कोई ठोस सुरक्षा उपाय नहीं किए गए।