रिफाइनरी हादसा: साजिश, तकनीकी चूक या उद्घाटन की जल्दबाजी? ‘कमीशनिंग फेज’ में लगी आग ने उठाए बड़े सवाल
पचपदरा रिफाइनरी में उद्घाटन से पहले लगी आग ने सुरक्षा सिस्टम, कमीशनिंग फेज और जल्दबाजी में काम पूरा करने पर सवाल खड़े कर दिए हैं। शुरुआती जांच में सेंसर और अर्ली वार्निंग सिस्टम के फेल होने की बात सामने आई है। एनआईए हादसे से पहले के 48 घंटे की जांच कर रही है, जबकि इस घटना से प्रोजेक्ट की टाइमलाइन और लागत दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
पचपदरा रिफाइनरी में उद्घाटन से कुछ घंटे पहले लगी आग अब महज एक हादसा नहीं रह गई है, बल्कि यह कई गंभीर सवालों और आशंकाओं का केंद्र बन चुकी है। करोड़ों रुपए की लागत से बन रही इस महत्वाकांक्षी परियोजना में सुरक्षा, टाइमिंग और तकनीकी प्रक्रियाओं को लेकर जांच एजेंसियां हर एंगल से पड़ताल कर रही हैं।
8 साल में 90% काम, फिर 10% में जल्दबाजी क्यों?
पेट्रोलियम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2025 तक रिफाइनरी का लगभग 90.4% काम पूरा हो चुका था, जबकि 20 अप्रैल तक यह बढ़कर करीब 92% ही पहुंचा। यानी 8 साल में जहां प्रोजेक्ट 90% तक पहुंचा, वहीं शेष करीब 10% काम बेहद कम समय में पूरा करने की कोशिश की जा रही थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि 90% से 100% तक का चरण, जिसे ‘कमीशनिंग फेज’ कहा जाता है, सबसे संवेदनशील होता है। इस दौरान सिस्टम टेस्टिंग, प्रेशर चेक, लीकेज कंट्रोल और सेफ्टी वैलिडेशन जैसे अहम काम होते हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या उद्घाटन की जल्दबाजी में इस महत्वपूर्ण चरण को पूरी सावधानी से पूरा नहीं किया गया?
ट्रायल के दौरान लगी आग, यूनिट पूरी तरह सुरक्षित नहीं
जानकारी के अनुसार, रिफाइनरी की 9 में से 8 यूनिट्स का मैकेनिकल कार्य पूरा हो चुका था, लेकिन सभी यूनिट्स पूरी तरह ऑपरेशनल नहीं थीं। खासकर क्रूड डिस्टिलेशन यूनिट (CDU) में पहली बार कच्चा तेल डाला जा रहा था, जो सबसे जोखिम भरा चरण माना जाता है।
मानकों के मुताबिक, किसी भी यूनिट को पूरी तरह चालू मानने से पहले उसे लगातार 72 घंटे बिना किसी रुकावट के चलाना जरूरी होता है। लेकिन हादसे के समय यूनिट ट्रायल पर थी और 13 में से 4 पेट्रोकेमिकल यूनिट्स अभी निर्माणाधीन थीं। जिस हिस्से में आग लगी, वह मैकेनिकली तैयार जरूर था, लेकिन ऑपरेशन के लिहाज से पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता।
अर्ली वार्निंग सिस्टम फेल, सेंसर नहीं दे पाए अलर्ट
हादसे का सबसे गंभीर पहलू हाईटेक सुरक्षा सिस्टम का फेल होना माना जा रहा है। रिफाइनरी में लगे गैस सेंसर समय पर अलर्ट देने में नाकाम रहे। सामान्य स्थिति में गैस रिसाव होते ही अलार्म बजना चाहिए था और ऑटोमेटिक फायर सप्रेशन सिस्टम तुरंत सक्रिय हो जाना चाहिए था।
हालांकि, स्प्रिंकलर सिस्टम बाद में चालू हुआ, लेकिन शुरुआती चेतावनी नहीं मिल पाने से नुकसान बढ़ गया। अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि यह तकनीकी खराबी थी या किसी प्रकार की छेड़छाड़।
जांच एजेंसियों का फोकस: आखिरी 48 घंटे
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) और गृह मंत्रालय की टीमें हादसे से पहले के 48 घंटों की गतिविधियों पर विशेष फोकस कर रही हैं। कंट्रोल रूम के डेटा लॉग, सीसीटीवी फुटेज और साइट पर आने-जाने वाले हर व्यक्ति की मूवमेंट की गहन जांच की जा रही है।
साथ ही, ऑटोमेटिक फायर सप्रेशन सिस्टम, गैस सेंसर और अर्ली वार्निंग सिस्टम का तकनीकी ऑडिट भी कराया जाएगा। सेंट्रल फॉर हाई टेक्नोलॉजी के विशेषज्ञ इस पूरे सिस्टम की जांच करेंगे।
प्रोजेक्ट की टाइमलाइन और लागत पर असर
इस हादसे का सीधा असर रिफाइनरी के कमर्शियल ऑपरेशन पर पड़ा है। पहले 1 जुलाई 2026 से उत्पादन शुरू करने की योजना थी, लेकिन अब प्रभावित यूनिट को दोबारा तैयार करने में 4 से 6 महीने का समय लग सकता है।
परियोजना की लागत पहले ही करीब 79,450 करोड़ रुपए तक पहुंच चुकी है, और अब इसमें और बढ़ोतरी की संभावना जताई जा रही है।
सुरक्षा में भी बड़ी चूक, SHO सस्पेंड
हादसे के साथ ही सुरक्षा व्यवस्था में भी गंभीर लापरवाही सामने आई। एक युवक प्रतिबंधित क्षेत्र में घुसकर सीधे वीवीआईपी मंच तक पहुंच गया और वहां से वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया।
मामले को गंभीरता से लेते हुए जोधपुर रेंज के आईजी ने पचपदरा थाना प्रभारी को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। साथ ही, मौके पर तैनात सुरक्षा बलों की भूमिका की भी जांच की जा रही है।
निष्कर्ष
पचपदरा रिफाइनरी हादसा अब कई अहम सवाल खड़े कर रहा है—क्या यह सिर्फ एक तकनीकी दुर्घटना थी, या उद्घाटन की जल्दबाजी में सुरक्षा मानकों से समझौता किया गया? या फिर इसके पीछे कोई साजिश छिपी है?