जोधपुर की सूर्य चमक अब कचरे के ढेर में दफन! स्वच्छ भारत का सपना ख़त्म होता नजर आ रहा ......
जोधपुर, जो सूर्यनगरी के नाम से मशहूर है, अब कचरे के ढेरों में डूबता नजर आ रहा है। स्वच्छ भारत अभियान यहाँ ख़त्म होता दिख रहा है। लोग घर साफ़ रखते हैं, लेकिन सड़कों पर कूड़ा फेंकते हैं। पॉलीथिन और प्लास्टिक खाकर गाय-कुत्ते जैसे पशु मर रहे हैं। होटलों का बचा खाना और अपशिष्ट बीमारियाँ फैला रहा है। नगर निगम और जनता दोनों ज़िम्मेदार हैं। स्वच्छता सिर्फ़ सरकार का नहीं, हर नागरिक का कर्तव्य है।
जोधपुर (राजस्थान): एक समय सूर्यनगरी के नाम से मशहूर जोधपुर, जहां नीले घरों की चमक और मेहरानगढ़ किले की भव्यता दुनिया भर के पर्यटकों को लुभाती थी, आज कचरे के विशाल ढेरों से घिरता नजर आ रहा है। स्वच्छ भारत अभियान की लहर जो 2014 में पूरे देश में चली थी, वो अब जोधपुर में धीरे-धीरे खत्म होती दिख रही है। शहर की सड़कें, गलियां और खुले मैदान प्लास्टिक, पॉलीथिन और खाने के अपशिष्ट से अटे पड़े हैं, जिससे न सिर्फ इंसानों का जीना दूभर हो रहा है, बल्कि मासूम पशु भी अपनी जान गंवा रहे हैं।शहर के विभिन्न इलाकों जैसे पाल रोड, सरदारपुरा, शास्त्री नगर और यहां तक कि पर्यटन स्थलों के आसपास कचरे के ढेर आम दृश्य बन गए हैं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि लोग अपने घरों को चमकदार बनाते हैं, लेकिन बाहर की सड़कों को कूड़ाघर समझकर इस्तेमाल करते हैं। "हम रोज सुबह-सुबह घर साफ करते हैं, लेकिन शाम तक गली में कचरा फेंक देते हैं। ये आदत हमें मार रही है," कहती हैं सरदारपुरा की रहने वाली राधा देवी।
सबसे दर्दनाक प्रभाव पड़ रहा है आवारा पशुओं पर। गाय, कुत्ते और अन्य जानवर भोजन की तलाश में इन कचरे के ढेरों में मुंह मारते हैं। उन्हें क्या पता कि चमकदार पॉलीथिन या प्लास्टिक की थैली कोई खाने की चीज नहीं है! वे इसे निगल जाते हैं, जिससे उनके पेट में ब्लॉकेज हो जाता है और धीमी मौत उन्हें घेर लेती है। पशु चिकित्सकों के अनुसार, जोधपुर में हर महीने दर्जनों गायें और कुत्ते पॉलीथिन खाने से मर रहे हैं। "पिछले हफ्ते ही हमने तीन गायों का पोस्टमॉर्टम किया, सबके पेट में 5-10 किलो प्लास्टिक भरा था," बताते हैं शहर के एक वेटरनरी डॉक्टर डॉ. आर.के. मीणा।बड़ी-बड़ी होटलों और रेस्टोरेंट्स का योगदान भी कम नहीं। पर्यटकों से भरे इन होटलों से निकलने वाला बचा हुआ खाना, सड़ा हुआ भोजन और पैकेजिंग सामग्री खुले में फेंक दी जाती है। ये अपशिष्ट न सिर्फ पशुओं को बीमार बनाते हैं, बल्कि मच्छरों, मक्खियों और चूहों का अड्डा बनकर डेंगू, मलेरिया जैसी बीमारियां फैला रहे हैं। जोधपुर नगर निगम पर सवाल तो उठते ही हैं – सफाई कर्मचारियों की कमी, डोर-टू-डोर कलेक्शन की नाकामी और डंपिंग यार्ड की अव्यवस्था। लेकिन असली जिम्मेदार कौन? जनता खुद!निगम के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "हम रोज 500 टन कचरा इकट्ठा करते हैं, लेकिन लोग सहयोग नहीं करते। कचरा अलग-अलग करने की अपील पर कोई ध्यान नहीं देता।" स्वच्छ भारत अभियान के तहत शुरू की गईं कई योजनाएं अब कागजों तक सीमित हो गई हैं। शहर में लगे डस्टबिन खाली पड़े रहते हैं, जबकि कचरा सड़कों पर बिखरा मिलता है।स्थानीय एनजीओ 'क्लीन जोधपुर अभियान' के संयोजक महेश जोशी कहते हैं, "ये सिर्फ निगम का काम नहीं, हर नागरिक का कर्तव्य है। अगर हम अपने देश को स्वच्छ नहीं रखेंगे, तो सूर्यनगरी की चमक हमेशा के लिए खो जाएगी। पशु मर रहे हैं, बच्चे बीमार पड़ रहे हैं – ये चेतावनी है।" वे मांग कर रहे हैं कि होटलों पर सख्त नियम लागू हों, प्लास्टिक बैन को सख्ती से अमल में लाया जाए और स्कूलों में स्वच्छता शिक्षा अनिवार्य हो।जोधपुर की ये हालत पूरे देश के लिए सबक है। स्वच्छ भारत सिर्फ सरकारी अभियान नहीं, बल्कि हर भारतीय की जिम्मेदारी है। अगर अभी नहीं चेते, तो सूर्यनगरी कचरे की नगरी बनकर रह जाएगी। क्या हम इंतजार करेंगे अगली महामारी या पशुओं की सामूहिक मौत का? समय है जागने का!