शीतलाष्टमी पर शील की डूंगरी में उमड़ा आस्था का सैलाब, लक्खी मेले में लाखों श्रद्धालु पहुंचे
शीतलाष्टमी के अवसर पर जयपुर के चाकसू स्थित शील की डूंगरी में शीतला माता के प्रसिद्ध लक्खी मेले में लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। भक्त 151 सीढ़ियां चढ़कर माता के दर्शन कर रहे हैं और सुबह से ही लंबी कतारें लगी हुई हैं। इस दिन श्रद्धालु माता को बासोड़ा यानी एक दिन पहले बनाए गए ठंडे पकवानों का भोग लगाते हैं। करीब 600 साल पुराने इस मंदिर में होली के आठ दिन बाद हर साल यह बड़ा मेला भरता है। मेले को लेकर प्रशासन ने सुरक्षा और व्यवस्थाएं भी चाक-चौबंद की हैं।
शीतलाष्टमी के अवसर पर राजधानी जयपुर के चाकसू स्थित शील की डूंगरी में लगने वाले प्रसिद्ध लक्खी मेले में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। माता शीतला के दर्शन के लिए दूर-दूर से लाखों भक्त यहां पहुंच रहे हैं। पहाड़ी पर बने मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्त 151 सीढ़ियां चढ़ते हैं और सुबह से ही मंदिर परिसर में दर्शन के लिए लंबी कतारें लगी हुई हैं। मेले में श्रद्धालुओं का आना मंगलवार शाम से ही शुरू हो गया था, जो बसौड़ा के दिन अपने चरम पर पहुंच गया।
माता को ठंडे पकवानों का लगाया जाता है भोग
शीतलाष्टमी के दिन माता शीतला को ठंडे व्यंजनों का भोग लगाने की परंपरा है। मान्यता के अनुसार भक्त सप्तमी के दिन भोजन बनाकर रखते हैं और अष्टमी के दिन वही बासी या ठंडा भोजन माता को अर्पित करते हैं। इस प्रसाद में राबड़ी, पुआ, दही सहित कई पारंपरिक व्यंजन शामिल होते हैं। श्रद्धालु इन पकवानों का भोग लगाकर परिवार की सुख-समृद्धि और रोगों से रक्षा की कामना करते हैं।
करीब 600 साल पुराना है शील की डूंगरी का मंदिर
जयपुर जिले की चाकसू तहसील में स्थित शील की डूंगरी एक ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल है। माना जाता है कि करीब 600 साल पहले इस मंदिर की स्थापना हुई थी। मंदिर परिसर में बनी बारहदरी पर लगे शिलालेख के अनुसार जयपुर के तत्कालीन शासक माधोसिंह के पुत्र गंगासिंह और गोपालसिंह को चेचक हो गई थी, जो माता शीतला की कृपा से ठीक हो गई। इसके बाद राजा माधोसिंह ने यहां मंदिर और बारहदरी का निर्माण करवाया।
मंदिर की पहाड़ी पर विराजमान माता शीतला को चेचक की देवी माना जाता है और ग्रामीण क्षेत्रों में उन्हें ‘सेढ माता’ के नाम से भी पूजा जाता है।
होली के आठ दिन बाद भरता है भव्य मेला
हर साल होली के आठ दिन बाद यानी चैत्र कृष्ण अष्टमी को यहां भव्य लक्खी मेले का आयोजन होता है। इस दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन करने पहुंचते हैं और ‘बासोड़ा’ के रूप में एक दिन पहले बना ठंडा भोजन माता को अर्पित करते हैं।
प्रशासन की ओर से पुख्ता इंतजाम
मेले को देखते हुए मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्र में प्रशासन की ओर से सुरक्षा और व्यवस्थाओं के व्यापक इंतजाम किए गए हैं। दिनभर मंदिर में पूजा-अर्चना और दर्शन का सिलसिला जारी है, वहीं पूरे मेले में भक्तिमय माहौल बना हुआ है।