प्याज 2 रुपये किलो! अलवर मंडी में किसान नदी में फेंक रहे टनों प्याज, कर्ज ने तोड़ी कमर – “ किसानों का कहना जहर खाना पड़ेगा”
राजस्थान के अलवर में देश की दूसरी सबसे बड़ी प्याज मंडी में इस साल प्याज 2-5 रुपये किलो बिक रहा है, जो उत्पादन लागत (150-250 रुपये प्रति कट्टा) से भी कम है। नमी वाली फसल, महाराष्ट्र-कर्नाटक की प्रतिस्पर्धा, निर्यात बंदी और पुराने स्टॉक के कारण डिमांड गायब है। किसान प्याज नदी में फेंक रहे हैं, खेत में सड़ने दे रहे हैं या कटाई बंद कर चुके हैं। कर्ज, भूख और आत्महत्या की नौबत आ गई है। किसान एमएसपी, निर्यात खोलने और सरकारी मदद की गुहार लगा रहे हैं।
राजस्थान के अलवर जिले में स्थित देश की दूसरी सबसे बड़ी प्याज मंडी, जो कभी श्रीलंका, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों में लाल प्याज की चमक बिखेरती थी, आज किसानों के आंसुओं से तरबतर हो चुकी है। यहां का लाल प्याज अपनी स्वादिष्ट और रंगीन किस्म के लिए मशहूर रहा है, लेकिन 2025 के इस मौसम में हालात उलट गए हैं। मंडी में प्याज की आवक तो शुरू हो गई है, मगर दाम इतने गिर चुके हैं कि किसान उत्पादन लागत भी नहीं निकाल पा रहे। 2 से 5 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा प्याज न केवल किसानों की कमर तोड़ रहा है, बल्कि उनके परिवारों को कर्ज के बोझ तले दबोच रहा है। कई किसान तो निराशा के आलम में फसल को नदी में बहा रहे हैं या खेतों में सड़ने दे रहे हैं। आइए, इस संकट की पूरी सच्चाई को गहराई से समझें, जहां मेहनत का फल जहर बन गया है।
अलवर मंडी: एशिया की दूसरी बड़ी प्याज हब, जो आज संकट की चपेट में
अलवर की प्याज मंडी महाराष्ट्र की लासलगांव के बाद एशिया की दूसरी सबसे बड़ी मंडी है। यहां प्रतिदिन हजारों क्विंटल प्याज की आवक होती है, जो न केवल राजस्थान बल्कि पूरे उत्तर भारत को सप्लाई करती है। इस साल अलवर जिले में करीब 16 हजार हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में प्याज की बुवाई हुई, जबकि पड़ोसी खैरथल-तिजारा जिले में 12 हजार हेक्टेयर से ज्यादा। दिवाली के बाद आवक तेज हो गई, मगर खुशी के बजाय चिंता की लकीरें गहरी हो गईं। मंडी के संरक्षक अभय सैनी के अनुसार, अभी तक 40-70 हजार कट्टे प्रतिदिन आ रहे हैं, लेकिन गुणवत्ता की कमी से खरीदार पीछे हट गए हैं।खुले बाजार में प्याज 20 रुपये किलो तक बिक रहा है, मगर मंडी में किसानों को 200-600 रुपये प्रति क्विंटल (यानी 2-6 रुपये किलो) ही मिल पा रहा है।
यह दाम उत्पादन लागत के आधे से भी कम हैं – एक बीघा (लगभग 0.6 एकड़) प्याज उगाने में 50,000 रुपये तक खर्च हो जाते हैं, जिसमें बीज, खाद, कीटनाशक, मजदूरी और कटाई शामिल है।
दाम गिरने की जड़ें: नमी, प्रतिस्पर्धा और निर्यात का संकट
इस संकट की मुख्य वजह अलवर के प्याज में नमी की समस्या है। हाल की असमय बारिश ने फसल को प्रभावित किया, जिससे प्याज की गुणवत्ता गिर गई। विशेषज्ञों का कहना है कि अलवर का प्याज नमी के कारण लंबे समय तक स्टोर नहीं किया जा सकता, जबकि महाराष्ट्र (नासिक) और कर्नाटक का प्याज महीनों तक टिक जाता है। नासिक की प्याज की भारी आवक ने अलवर के बाजार पर दबाव डाला है, जहां थोक भाव पहले 45 रुपये किलो तक पहुंचे थे, लेकिन अब 25 रुपये पर सिमट गए हैं। निर्यात पर भी ब्रेक लग गया है। पहले अलवर का लाल प्याज श्रीलंका, पाकिस्तान और बांग्लादेश में छा जाता था, लेकिन 2025 में निर्यात प्रतिबंधों के कारण मांग 70% तक गिर गई। अप्रैल 2025 में प्रतिबंध हटे, मगर तब तक पाकिस्तान, मिस्र और चीन ने बाजार कब्जा लिया। इसके अलावा, व्यापारियों के पास पुरानी फसल का स्टॉक बाकी है, जो नई आवक से भावों को और नीचे खींच रहा है। उद्यान विभाग के अनुसार, इस साल बंपर पैदावार हुई, लेकिन बिना एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) के किसान हताश हैं।
किसानों का दर्द: कर्ज, भूख और टूटे सपने
अलवर के ढिगावड़ा, चंदपुरा और राजगढ़ जैसे गांवों में प्याज किसानों की जिंदगी उजड़ रही है। ढिगावड़ा के किसान सुखराम (नाम परिवर्तित) ने बताया, "सिर पर पहले से कर्ज का पहाड़ था, अब तो जहर की पुड़िया ही बची है। तीन बीघा में 50 हजार रुपये का बीज डाला, लेकिन एक पैसा भी नहीं बिका। कर्जदारों का डर सता रहा है, मजदूरी करनी पड़ सकती है।" राजगढ़ के बुजुर्ग किसान धापली ने कहा, "मंडी ले जाने की हिम्मत नहीं बची। 3 बीघा में मेहनत की, लेकिन पेट भरना मुश्किल हो गया।" उन्होंने बाजरे की फसल तक छोड़ दी, सब बेकार।चंदपुरा के सुरेश खोड़ा ने चाचा के साथ 90 कट्टे प्याज नदी में फेंक दिए। पहले मंडी में 2 रुपये किलो मिले, तो निराश होकर वापस लाए। कटाई का खर्च 150 रुपये प्रति कट्टा और खाली कट्टा 50 रुपये का – कुल मिलाकर घाटा ही घाटा। 7 बीघा की फसल पर एक रुपया भी नहीं मिला। युवा किसान विनोद ने जेवर तक गिरवी रख दिया, जबकि नंदलाल ने 2 बीघा प्याज खेत में सड़ने दिया – कटाई का 30 हजार रुपये प्रति बीघा खर्चा वहन नहीं कर सके।ढिगावड़ा के सचिन की कहानी सबसे मार्मिक है। "मंडी में 200 रुपये प्रति कट्टा मिले, खर्च 250। बहन की शादी के सपने टूट गए। सरकार से मदद चाहिए।" किसान महापंचायत के रामफल जाट ने कहा, "सरकार की नीतियां किसानों की कमर तोड़ रही हैं। दिसंबर 30 को अन्नदाता हुंकार रैली होगी।"
सरकार की भूमिका: एमएसपी की मांग और राहत की उम्मीद
किसान संगठन एमएसपी 3,000 रुपये प्रति क्विंटल की मांग कर रहे हैं। केंद्र सरकार बफर स्टॉक रिलीज कर उपभोक्ताओं को राहत दे रही है, लेकिन इससे किसानों का नुकसान बढ़ा। हाल ही में केंद्र ने निर्यात को बढ़ावा देने और नुकसान की भरपाई की योजना पर विचार कर रही है, मगर अभी तक अमल नहीं हुआ। अलवर मंडी के पदाधिकारी सलाह दे रहे हैं कि 10 दिन रुकें, अच्छी गुणवत्ता वाली फसल आने पर दक्षिण भारत जैसे बाजारों में डिमांड लौट सकती है। कुछ किसान सर्दियों की शुरुआत का इंतजार कर कटाई टाल रहे हैं, उम्मीद है कि सावन के बाद मांग बढ़ेगी।यह संकट केवल अलवर तक सीमित नहीं – महाराष्ट्र, कर्नाटक और गुजरात के प्याज बेल्ट में भी किसान परेशान हैं। सरकार अगर तुरंत एमएसपी लागू करे, निर्यात सब्सिडी दे और स्टोरेज सुविधाएं बढ़ाए, तो यह आंसुओं का सौदा खुशहाली में बदल सकता है। वरना, अन्नदाता का बलिदान जारी रहेगा। क्या सरकार सुन रही है? किसानों की पुकार का इंतजार जारी है।