राजस्थान के कोटपूतली-बहरोड़ जिले में छापाला भैरूजी मंदिर में 651 क्विंटल चूरमे का महाभोग: 4 लाख श्रद्धालुओं के लिए अनोखी तैयारी, JCB से मिलाया जा रहा प्रसाद
राजस्थान के कोटपूतली-बहरोड़ में छापाला भैरूजी मंदिर के 17वें लक्खी मेले के लिए 651 क्विंटल चूरमे की महाप्रसादी तैयार की गई। JCB, थ्रेसर और ट्रैक्टर जैसी मशीनों से मिलाकर बनाया गया यह अनोखा प्रसाद 3-4 लाख श्रद्धालुओं में बांटा जा रहा है। वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जहां आस्था और आधुनिकता का अद्भुत संगम दिख रहा है।
राजस्थान के कोटपूतली-बहरोड़ जिले में अरावली पहाड़ियों के बीच स्थित प्रसिद्ध छापाला भैरूजी मंदिर (छापाला भैरू बाबा मंदिर) इन दिनों भक्ति और आस्था के अनोखे रंग में रंगा हुआ है। यहां 30 जनवरी 2026 को 17वें लक्खी मेले का आयोजन हो रहा है, जिसमें इस बार 651 क्विंटल (करीब 65,100 किलोग्राम) चूरमे का विशाल महाभोग लगाया जा रहा है। यह प्रसाद करीब 4 लाख (कुछ स्रोतों में 3 लाख से अधिक) श्रद्धालुओं के लिए तैयार किया जा रहा है, जो राजस्थान के अलावा हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों से बड़ी संख्या में दर्शन और प्रसाद ग्रहण करने पहुंच रहे हैं।
मेले की खासियत और भैरू बाबा की महिमा
छापाला भैरूजी मंदिर भक्तों में बेहद प्रसिद्ध है, जहां मन्नत मांगने पर सभी इच्छाएं पूरी होने की मान्यता है। इसी वजह से लक्खी मेला हर साल लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। इस बार मेले में भक्ति का ऐतिहासिक नजारा देखने को मिल रहा है, क्योंकि इतनी बड़ी मात्रा में प्रसाद तैयार करने की परंपरा खुद में अनोखी है। पिछले साल 551 क्विंटल चूरमा तैयार किया गया था, लेकिन श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए इस बार इसे बढ़ाकर 651 क्विंटल कर दिया गया है।
प्रसाद कैसे तैयार हो रहा है? – आधुनिक मशीनों का अनोखा इस्तेमाल
इस महाप्रसादी को तैयार करने में पारंपरिक तरीके के साथ-साथ आधुनिक तकनीक का भी सहारा लिया जा रहा है, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।बाटी सेंकने की व्यवस्था: 100 मीटर लंबे जगरे (परंपरागत भट्टी) में 150 क्विंटल आटे से बनी बाटियों को सेंका गया।ईंधन: जगरे को जलाने के लिए 450 क्विंटल गोबर के उपले इस्तेमाल किए गए।
चूरमा बनाने की प्रक्रिया: सेंकी गई बाटियों को थ्रेसर मशीन में पीसा गया। फिर इसमें 100 क्विंटल सूजी, 35 क्विंटल देसी घी, 130 क्विंटल चीनी (खांड), 10 क्विंटल मावा, 30 क्विंटल बादाम, 3 क्विंटल काजू, 3 क्विंटल किशमिश, 100 क्विंटल दूध (आटे में मिलाया गया), 80 क्विंटल दूध से बना दही और अन्य ड्राई फ्रूट्स मिलाए गए।
मिक्सिंग: इतनी बड़ी मात्रा को हाथों से मिलाना असंभव होने के कारण जेसीबी मशीनों (कुछ रिपोर्ट्स में 3 JCB), ट्रैक्टर-ट्रॉली, डंपर और थ्रेसर जैसी भारी मशीनों से चूरमा मिलाया और तैयार किया जा रहा है। यह दृश्य देखने वाले लोग हैरान रह जाते हैं, क्योंकि जहां रेत-बजरी जैसा दिखता है, वह असल में मीठा चूरमा होता है।अन्य प्रसाद: चूरमे के अलावा दाल के लिए 40 क्विंटल दाल, 20 पीपे सरसों का तेल, 2 क्विंटल हरी मिर्च, 1 क्विंटल हरा धनिया, 60 किलो लाल मिर्च, 60 किलो हल्दी, 40 किलो जीरा आदि का इस्तेमाल किया गया।करीब 5000 से ज्यादा स्वयंसेवक (ग्रामीण और भक्त) दिन-रात मिलकर यह सेवा कर रहे हैं। मेले में प्रसाद के साथ दही और दाल भी परोसी जा रही है।
मेले की अन्य तैयारियां और आकर्षण
कलश यात्रा: मेले से एक दिन पहले (29 जनवरी) हजारों महिलाओं (कुछ रिपोर्ट्स में 21 हजार) ने विशाल कलश यात्रा निकाली, जिसमें ड्रोन और हेलीकॉप्टर से पुष्प वर्षा की गई।व्यवस्थाएं: लाखों श्रद्धालुओं के लिए पानी के टैंकर (25 टैंकर), सुरक्षा, 2.5 लाख पत्तल-दोने और 4 लाख कप की व्यवस्था की गई है।सजावट और उत्साह: मंदिर की खास सजावट, जागरण और भंडारे की चर्चा अब सोशल मीडिया से लेकर चौक-चौराहों तक पहुंच चुकी है।