चंबल के पानी में अचानक ‘कयामत’—एक झटके में पिता गायब, बेटा देखता रह गया वो खौफनाक मंजर

चंबल नदी का शांत पानी अचानक मौत में बदल गया… एक झपट्टा, और पिता आंखों के सामने गायब—बेटा कुछ भी नहीं कर सका।

Apr 29, 2026 - 20:28
चंबल के पानी में अचानक ‘कयामत’—एक झटके में पिता गायब, बेटा देखता रह गया वो खौफनाक मंजर

कोटा जिले के खातौली थाना क्षेत्र से एक ऐसी दर्दनाक और रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना सामने आई है, जिसने पूरे इलाके को दहला दिया है। चंबल नदी के शांत दिखने वाले पानी के नीचे मौत इस कदर छिपी थी, इसका अंदाजा किसी को नहीं था।

बुधवार सुबह करीब 10 बजे घटोद गांव के रहने वाले 45 वर्षीय मुरली गुर्जर अपने दो बेटों चंद्र प्रकाश और गोलूके साथ नदी किनारे अपनी भेड़ों को चरा रहे थे। रोज की तरह सब कुछ सामान्य था, सूरज की रोशनी, बहती नदी और परिवार की हल्की-फुल्की व्यस्तता।

लेकिन कुछ ही पलों में यह सुकून एक भयावह मंजर में बदल गया।

पानी से निकला ‘मौत का झपट्टा’

जैसे ही मुरली गुर्जर और उनके बेटे नदी के कम गहरे हिस्से में भेड़ों को नहला रहे थे, अचानक पानी के अंदर से एक विशाल मगरमच्छ बाहर आया। उसने सबसे पहले 22 वर्षीय चंद्र प्रकाश पर हमला किया।

चौंकाने वाली बात यह रही कि चंद्र प्रकाश किसी तरह अपनी जान बचाने में सफल रहा, लेकिन यह राहत ज्यादा देर टिक नहीं सकी।

पलभर में उजड़ गया परिवार

मगरमच्छ ने तुरंत अपना रुख बदला और पास ही खड़े पिता मुरली गुर्जर को अपने जबड़ों में जकड़ लिया। देखते ही देखते वह उन्हें पानी की गहराइयों में खींच ले गया।

बेटों की आंखों के सामने यह सब होता रहा, लेकिन वे कुछ भी नहीं कर सके। उनकी चीखें नदी किनारे गूंजती रहीं, मगर पानी की गहराई में सब कुछ गायब हो चुका था।

चार घंटे चला रेस्क्यू, लेकिन देर हो चुकी थी

घटना की सूचना मिलते ही ग्रामीण मौके पर जुट गए। स्थानीय लोगों ने नावों की मदद से लगभग चार घंटे तक मुरली की तलाश की।

प्रशासन को भी सूचना दी गई, लेकिन संसाधनों की कमी के कारण रेस्क्यू अभियान धीमा रहा। SDRF टीम के पहुंचने से पहले ही ग्रामीणों ने घटनास्थल से लगभग 30 मीटर दूर मुरली गुर्जर का बेजान शरीर बरामद कर लिया।

 गांव में मातम, घायल बेटा अस्पताल में

मुरली गुर्जर की मौत से पूरे गांव में शोक की लहर दौड़ गई है। वहीं, मगरमच्छ के हमले में घायल चंद्र प्रकाश का इलाज चल रहा है।

परिवार पर टूटा यह दुख लोगों को झकझोर गया है और हर कोई यही सवाल पूछ रहा है कि आखिर कब तक चंबल किनारे बसे गांव ऐसे खतरों के साए में जीते रहेंगे?

बड़ा सवाल

यह घटना सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि एक गंभीर चेतावनी है—

क्या चंबल नदी के किनारे रहने वाले लोग अब सच में सुरक्षित हैं?

और क्या प्रशासन की धीमी प्रतिक्रिया ऐसे दर्दनाक हादसों को रोकने में नाकाफी साबित हो रही है?

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