सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार दी इच्छामृत्यु की अनुमति: 13 साल से कोमा में पड़े हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया की मंजूरी, परिवार की लंबी लड़ाई सफल

सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले में 32 वर्षीय हरीश राणा (13 साल से कोमा/वेजिटेटिव स्टेट में) को पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी। परिवार की याचिका पर लाइफ सपोर्ट हटाने का आदेश दिया गया, जो भारत में पहला ऐसा लागू मामला है। कोर्ट ने गरिमा बनाए रखते हुए AIIMS में चरणबद्ध प्रक्रिया के निर्देश दिए।

Mohit Parihar
Mohit Parihar Verified Public Figure • 11 Jun, 2026 Sub Editor
March 12, 2026 • 6:19 PM  73
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सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार दी इच्छामृत्यु की अनुमति: 13 साल से कोमा में पड़े हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया की मंजूरी, परिवार की लंबी लड़ाई सफल
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12 Mar 2026
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सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार दी इच्छामृत्यु की अनुमति: 13 साल से कोमा में पड़े हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया की मंजूरी, परिवार की लंबी लड़ाई सफल

भारत के इतिहास में एक ऐतिहासिक और भावुक फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (11 मार्च 2026) को 32 वर्षीय हरीश राणा के लिए पैसिव यूथेनेशिया (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की अनुमति दे दी है। यह देश में पहला ऐसा मामला है जहां सुप्रीम कोर्ट ने 2018 के अपने दिशानिर्देशों को लागू करते हुए किसी मरीज के लाइफ सपोर्ट सिस्टम को हटाने की स्पष्ट मंजूरी दी है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने यह फैसला सुनाया, जिसमें कोर्ट ने मरीज की गरिमा और सर्वोत्तम हित को सर्वोपरि बताया।

हरीश राणा की दर्दनाक कहानी

हरीश राणा दिल्ली में जन्मे थे और चंडीगढ़ की पंजाब यूनिवर्सिटी से बीटेक कर रहे थे। वे पढ़ाई में टॉपर थे और उज्ज्वल भविष्य की ओर बढ़ रहे थे। लेकिन 20 अगस्त 2013 को एक भयानक हादसा हुआ—वे हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए। इस दुर्घटना में उन्हें गंभीर सिर की चोट लगी, जिसके कारण पूरे शरीर में लकवा (क्वाड्रिप्लेजिया) मार गया और वे स्थायी वेजिटेटिव स्टेट (persistent vegetative state) में चले गए।

13 साल से अधिक समय से हरीश बिस्तर पर पड़े हैं। वे न बोल सकते हैं, न महसूस कर सकते हैं, न हिल-डुल सकते हैं। उन्हें फीडिंग ट्यूब (PEG ट्यूब के जरिए क्लिनिकली असिस्टेड न्यूट्रिशन एंड हाइड्रेशन - CANH) और वेंटिलेटर जैसी मशीनों पर रखा गया है। डॉक्टरों के अनुसार, रिकवरी की कोई संभावना नहीं बची है। लंबे समय तक बिस्तर पर रहने से उनके शरीर पर बेडसोर्स (गहरे घाव) बन गए हैं और हालत लगातार बिगड़ रही है।

परिवार—मां निर्मला राणा और पिता अशोक राणा—के लिए यह स्थिति बेहद कष्टदायक रही है। वे पिछले कई सालों से लड़ रहे थे। आर्थिक बोझ इतना बढ़ गया कि परिवार टूट चुका है—वेंटिलेटर, दवाइयां, नर्सिंग और देखभाल पर लाखों रुपये खर्च हो चुके हैं। पिता अशोक राणा ने फैसले के बाद कहा, "हम इसके लिए लंबे समय से लड़ रहे थे। कौन से माता-पिता अपने बेटे के लिए ऐसा चाहेंगे। अब उसे एम्स ले जाया जाएगा।"

सुप्रीम कोर्ट का फैसला और तर्क

कोर्ट ने हरीश के माता-पिता की याचिका पर सुनवाई के बाद फैसला सुनाया कि लाइफ सपोर्ट (खासकर क्लिनिकली असिस्टेड न्यूट्रिशन एंड हाइड्रेशन) को चरणबद्ध और मानवीय तरीके से हटाया जाए। प्रक्रिया दिल्ली के AIIMS में पेलिएटिव केयर यूनिट में की जाएगी, ताकि मरीज की गरिमा बनी रहे।

जस्टिस पारदीवाला ने फैसला पढ़ते हुए भावुक हो गए और कहा कि यह स्थिति "बहुत, बहुत दुखद" है। उन्होंने शेक्सपीयर के "To be or not to be" का जिक्र किया और अमेरिकी धर्मगुरु हेनरी वार्ड बीचर के शब्दों का हवाला दिया कि ईश्वर जीवन स्वीकार करने या न करने के बारे में नहीं पूछता, लेकिन जीवन लेना पड़ता है।

कोर्ट ने दो मुख्य आधार बताए: लाइफ सपोर्ट चिकित्सा उपचार की श्रेणी में आता है, जिसे हटाया जा सकता है।यह मरीज के सर्वोत्तम हित और गरिमा में है, क्योंकि रिकवरी असंभव है।कोर्ट ने केंद्र सरकार से पैसिव यूथेनेशिया पर स्पष्ट कानून बनाने की सिफारिश भी की, क्योंकि फिलहाल यह केवल सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों पर निर्भर है।

पैसिव vs एक्टिव यूथेनेशिया: भारत में क्या कानूनी स्थिति?

पैसिव यूथेनेशिया: लाइफ सपोर्ट हटाना, ताकि मौत प्राकृतिक रूप से हो। भारत में वैध (2018 कॉमन कॉज केस में मान्यता मिली, जो आर्टिकल 21 के तहत "सम्मान से मरने" के अधिकार का हिस्सा है)।एक्टिव यूथेनेशिया: डॉक्टर द्वारा दवाई/इंजेक्शन देकर मौत देना—भारत में गैरकानूनी, हत्या या आत्महत्या में मदद माना जाता है।

2018 के दिशानिर्देश और प्रक्रिया

2018 में सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया को मान्यता दी थी। दो स्थितियां:लिविंग विल होने पर: मरीज ने पहले से लिखित इच्छा जाहिर की हो, तो दो मेडिकल बोर्ड की मंजूरी से लाइफ सपोर्ट हटाया जा सकता है।लिविंग विल न होने पर (जैसे हरीश के मामले में): परिवार की याचिका पर अस्पताल का मेडिकल बोर्ड रिपोर्ट बनाता है, फिर कलेक्टर द्वारा दूसरा बोर्ड जांच करता है। दोनों सहमत होने पर मजिस्ट्रेट के पास जाता है। विवाद होने पर हाईकोर्ट अपील।हरीश के मामले में यह प्रक्रिया कोर्ट की निगरानी में पूरी हुई। 11 दिसंबर 2025 को कोर्ट ने AIIMS को दूसरा बोर्ड बनाने का आदेश दिया था, जिसकी रिपोर्ट के आधार पर फैसला आया।

पहले के मामले: अरुणा शानबाग से हरीश राणा तक

अरुणा शानबाग केस (2011): 1973 में हमले के बाद 42 साल की नर्स कोमा में चली गईं। 2009 में याचिका दाखिल हुई, लेकिन कोर्ट ने अनुमति नहीं दी क्योंकि वे कुछ हद तक बिना मशीन के सांस ले रही थीं। 2015 में प्राकृतिक मौत हुई। इस केस ने पैसिव यूथेनेशिया की बहस शुरू की।हरीश राणा का केस पहला है जहां 2018 के फ्रेमवर्क को पूरी तरह लागू कर अनुमति दी गई।

Mohit Parihar Verified Public Figure • 11 Jun, 2026 Sub Editor

Mohit Parihar is a journalist at The Khatak, covering politics and public issues with a strong focus on ground reporting and factual storytelling.

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