10 दिन से टूटा हाथ लेकर इंसाफ की ठोकरें खा रहा कबाड़ बीनने वाला रमेश… पुलिस पर उठे गंभीर सवाल

पाली में एक कबाड़ बीनने वाले व्यक्ति पर हमला कर हाथ तोड़ दिया गया, लेकिन 10 दिन बाद भी कार्रवाई अधूरी है। पीड़ित इंसाफ के लिए पुलिस और एसपी ऑफिस के चक्कर काट रहा है।

Apr 29, 2026 - 16:35
10 दिन से टूटा हाथ लेकर इंसाफ की ठोकरें खा रहा कबाड़ बीनने वाला रमेश… पुलिस पर उठे गंभीर सवाल

क्या एक गरीब का टूटा हुआ हाथ इतना सस्ता हो गया है कि इंसाफ तक उसकी पहुंच ही न हो सके?

पाली जिले के रानी क्षेत्र में रहने वाले रमेश, जो कबाड़ बीनकर अपना जीवन चलाते हैं, आज इंसाफ की ऐसी लड़ाई लड़ रहे हैं जहां उनका टूटा हुआ हाथ सिर्फ दर्द नहीं, बल्कि सिस्टम पर सवाल बन चुका है।

हमला जिसने जिंदगी बदल दी

करीब 10 दिन पहले की बात है। रोज की तरह रमेश गलियों में कबाड़ इकट्ठा कर रहे थे। तभी तीन युवकों ने उन पर अचानक हमला कर दिया। यह हमला इतना गंभीर था कि रमेश का हाथ टूट गया और उन्हें गंभीर चोटें आईं।

घटना के बाद किसी तरह हिम्मत जुटाकर रमेश थाने पहुंचे और आरोपियों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज कराई। उन्हें उम्मीद थी कि कानून जल्द कार्रवाई करेगा और उन्हें इंसाफ मिलेगा।

10 दिन, लेकिन कार्रवाई अधूरी

लेकिन 10 दिन बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस है। रमेश के मुताबिक पुलिस की तरफ से सिर्फ एक ही जवाब मिलता रहा कार्रवाई जारी है।

इस बीच आरोपी खुलेआम घूमते रहे और पीड़ित अपने टूटे हुए हाथ के साथ इंसाफ की राह देखता रहा।

एसपी ऑफिस तक पहुंचा दर्द

स्थानीय थाने से निराश होकर रमेश मंगलवार को पाली एसपी मोनिका सेन के कार्यालय पहुंचे। भारी प्लास्टर लगे हाथ के साथ जब वह वहां पहुंचे तो उनकी स्थिति ने कई लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया।

रमेश का कहना है कि वह कबाड़ बीनने वाला है, शायद यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई, क्योंकि अगर किसी प्रभावशाली व्यक्ति के साथ ऐसा होता तो कार्रवाई कब की हो चुकी होती।

सिस्टम पर उठते सवाल

इस पूरे मामले ने पुलिस व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं—

क्या न्याय व्यक्ति की आर्थिक स्थिति देखकर तय होता है?

क्या गरीब की शिकायतों की सुनवाई में देरी सामान्य बात है?

आगे क्या?

एसपी ऑफिस से रमेश को आश्वासन जरूर मिला है, लेकिन असली सवाल अभी भी वही है—

क्या रमेश के हाथ का प्लास्टर उतरने से पहले आरोपियों के हाथों में हथकड़ी पहुंचेगी?

फिलहाल यह मामला सिर्फ एक हमले का नहीं, बल्कि इंसाफ की देरी और सिस्टम की संवेदनशीलता पर बड़ा सवाल बन चुका है।

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