संकट में साथ नहीं आया पाकिस्तान: सऊदी-ईरान तनाव ने डिफेंस एग्रीमेंट पर उठाए सवाल
ईरान और सऊदी अरब के बीच बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। 2025 में हुए रक्षा समझौते के बावजूद पाकिस्तान ने अब तक कोई सैन्य सहायता नहीं दी, जिससे सऊदी-पाकिस्तान डिफेंस पैक्ट की प्रभावशीलता पर बहस तेज हो गई है।
इस्लामाबाद। ईरान और सऊदी अरब के बीच बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं। सऊदी अरब पर हमलों के बीच पाकिस्तान फिलहाल सिर्फ कूटनीतिक बयानबाजी करता नजर आ रहा है। न तो उसने सऊदी अरब की रक्षा के लिए सैन्य सहायता भेजी है और न ही ईरान के खिलाफ कोई प्रत्यक्ष कार्रवाई की है। ऐसे में सितंबर 2025 में हुए पाकिस्तान-सऊदी अरब रणनीतिक रक्षा समझौते की प्रभावशीलता पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं।
रक्षा समझौते की खुली पोल?
पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच सितंबर 2025 में स्ट्रैटजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट (SMDA) हुआ था। इस समझौते के तहत यह प्रावधान किया गया था कि यदि किसी एक देश पर हमला होता है तो उसे दोनों देशों पर हमला माना जाएगा।
इस समझौते से सऊदी अरब को उम्मीद थी कि संकट की स्थिति में पाकिस्तान उसकी सैन्य मदद करेगा। पाकिस्तान मुस्लिम दुनिया का एकमात्र परमाणु शक्ति संपन्न देश है और अपनी मजबूत सैन्य क्षमता का दावा भी करता रहा है। लेकिन ईरान के हमलों के बीच अभी तक पाकिस्तान की ओर से कोई ठोस सैन्य कदम सामने नहीं आया है।
सिर्फ जुबानी समर्थन तक सीमित प्रतिक्रिया
ईरान के हमलों के बाद पाकिस्तान ने सऊदी अरब के प्रति समर्थन जरूर जताया है, लेकिन यह समर्थन मुख्य रूप से कूटनीतिक और बयानबाजी तक ही सीमित रहा है।
पाकिस्तानी सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ सऊदी अरब का दौरा कर चुके हैं और वहां सऊदी नेतृत्व के साथ एकजुटता जताई है। हालांकि, जमीनी स्तर पर पाकिस्तान ने न तो अपनी सेना तैनात की है और न ही कोई प्रत्यक्ष युद्धक सहायता की घोषणा की है।
ईरान से टकराव से क्यों बच रहा पाकिस्तान
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान ईरान के खिलाफ खुलकर खड़ा होने से इसलिए बच रहा है क्योंकि दोनों देशों के बीच भू-राजनीतिक और सामाजिक संबंध भी गहरे हैं।
पाकिस्तान और ईरान की सीमाएं एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। इसके अलावा पाकिस्तान में शिया समुदाय की बड़ी और प्रभावशाली आबादी है, खासकर गिलगित-बाल्टिस्तान जैसे क्षेत्रों में। यदि पाकिस्तान ईरान के खिलाफ सीधे सैन्य कार्रवाई करता है तो देश के भीतर भी असंतोष और तनाव बढ़ सकता है।
आर्थिक और रणनीतिक मजबूरियां
पाकिस्तान इस समय गंभीर आर्थिक संकट से भी जूझ रहा है। ऐसे हालात में किसी बड़े सैन्य संघर्ष में शामिल होना उसके लिए भारी पड़ सकता है।
इसके अलावा पाकिस्तान पहले से ही अफगानिस्तान सीमा पर सुरक्षा चुनौतियों और भारत के साथ तनावपूर्ण संबंधों का सामना कर रहा है। ऐसे में एक और मोर्चा खोलना उसके लिए जोखिम भरा कदम हो सकता है।
सऊदी अरब के लिए भी संकेत
विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान का सतर्क रुख सऊदी अरब के लिए भी एक संकेत है कि संकट की स्थिति में केवल रक्षा समझौते पर भरोसा करना पर्याप्त नहीं है।
फिलहाल पाकिस्तान कूटनीतिक संतुलन बनाकर चलने की कोशिश कर रहा है, ताकि वह न तो सऊदी अरब से दूरी बनाए और न ही ईरान के साथ सीधे टकराव की स्थिति में पहुंचे।