अंधेरे से शुरू हुआ सफर… और अंत में लिखी गई एक ऐसी जीत जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी…
एक ऐसी प्रेरणादायक कहानी, जहां एक बड़े हादसे ने जिंदगी को अंधेरे में धकेल दिया, लेकिन हौसले और मेहनत ने उसी अंधेरे को रोशनी में बदल दिया। संघर्ष, टूटन और तानों के बीच एक शख्स ने वो हासिल किया जिसे लोग असंभव मानते थे—और साबित कर दिया कि हालात चाहे जैसे भी हों, जीत जज्बे की होती है।
कहते हैं कि जब आंखें साथ छोड़ देती हैं, तो दुनिया रुक जाती है। रास्ते धुंधले हो जाते हैं और सपनों की चमक भी फीकी पड़ने लगती है।
लेकिन हर कहानी का एक दूसरा पहलू भी होता है—जहां अंधेरा खत्म नहीं होता, बल्कि वहीं से रोशनी की शुरुआत होती है। यह कहानी है राजस्थान के चूरू जिले के राजगढ़ निवासी अभिषेक कुल्हरी की, जिन्होंने RAS 2024 परीक्षा में ब्लाइंड कैटेगरी में दूसरी रैंक हासिल कर पूरे राज्य को प्रेरित कर दिया।
एक पल जिसने जिंदगी बदल दी
साल 2018 का एक सामान्य दिन था, लेकिन वही दिन अभिषेक की जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ बन गया। एक सड़क हादसे में रॉन्ग साइड से आ रहे ऑटो ने उनकी बाइक को टक्कर मार दी। इस दर्दनाक दुर्घटना में ऑटो के शीशे सीधे उनकी आंखों में जा लगे, और वहीं से उनकी दुनिया अंधेरे में डूब गई। यह सिर्फ एक हादसा नहीं था, बल्कि एक ऐसी शुरुआत थी जिसने उनके पूरे जीवन की दिशा बदल दी।
दर्द सिर्फ हादसे तक सीमित नहीं था
हादसे के बाद इलाज की प्रक्रिया और भी कठिन साबित हुई। अभिषेक बताते हैं कि शुरुआती समय में सही तरीके से आंखों की जांच नहीं हो सकी। उन्हें गंभीर स्थिति में ब्रेन सर्जरी तक से गुजरना पड़ा।जयपुर के SMS अस्पताल से लेकर AIIMS दिल्ली तक इलाज चला, कई सर्जरी हुईं, लेकिन उनकी आंखों की रोशनी वापस नहीं आ सकी। यह वह दौर था जब शारीरिक दर्द के साथ-साथ मानसिक संघर्ष भी लगातार बढ़ता गया।
समाज और तानों की परीक्षा
अंधेपन के बाद जीवन और भी कठिन हो गया। चलना, समझना और सामान्य जीवन जीना एक चुनौती बन गया।
सबसे कठिन था लोगों की सोच का सामना करना।
“अब तुम कुछ नहीं कर पाओगे…”
“तुम्हारा भविष्य खत्म हो गया है…”
ऐसे शब्द किसी भी इंसान को तोड़ सकते हैं, लेकिन अभिषेक के लिए यही शब्द उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गए।
हार को हथियार में बदलने का फैसला
इस अंधेरे दौर में उन्होंने खुद को समझना शुरू किया। मेडिटेशन और आत्म-विश्लेषण ने उनके जीवन में नया मोड़ लाया।
उन्होंने तय किया कि परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों, कोशिश रुकनी नहीं चाहिए। यहीं से उनकी नई यात्रा शुरू हुई।
खेल से आत्मविश्वास तक का सफर
अभिषेक ने पैरा स्पोर्ट्स की ओर कदम बढ़ाया और प्रसिद्ध पैरा एथलीट देवेंद्र झाझरिया से प्रेरणा ली।
उन्होंने घर पर ही कठिन प्रशिक्षण शुरू किया और मेहनत का परिणाम जल्द ही सामने आया।
2019 की स्टेट पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया—
- शॉट पुट में गोल्ड मेडल
- जैवलिन थ्रो में ब्रॉन्ज मेडल
इसके बाद उन्होंने नेशनल स्तर पर भी अपनी पहचान बनाई।
एक और चोट, लेकिन हिम्मत कायम
जीवन ने एक बार फिर परीक्षा ली जब वेटलिफ्टिंग के दौरान गंभीर चोट लग गई। डॉक्टरों ने लंबे आराम की सलाह दी, लेकिन अभिषेक ने हार नहीं मानी।
इसी दौरान उन्होंने अपने जीवन को एक नए उद्देश्य से जोड़ने का फैसला किया—सिविल सर्विस।
सिविल सर्विस की तैयारी का संघर्ष
अभिषेक के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी—बिना देखे पढ़ाई कैसे करें?
उन्होंने एक अनोखा तरीका अपनाया:
- दूसरों से नोट्स सुनना
- बार-बार रिपीट कराना
- ऑनलाइन क्लासेस को 2X स्पीड पर सुनना
- लगातार 14-15 घंटे पढ़ाई और 10-12 घंटे अभ्यास
यह सिर्फ पढ़ाई नहीं थी, यह धैर्य और इच्छाशक्ति की परीक्षा थी।
सफलता की ओर बढ़ता हर कदम
कई प्रयासों के बाद धीरे-धीरे सफलता मिलने लगी। नगर पालिका EO परीक्षा में वह बस 1 नंबर से चूक गए, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
2023 में उन्होंने RAS प्री परीक्षा पास की और जयपुर में मेंस की तैयारी शुरू की।
आखिरकार मिल गई मंजिल
RAS 2024 के परिणाम ने उनकी मेहनत को पहचान दी।
- ब्लाइंड कैटेगरी में दूसरी रैंक
- जनरल कैटेगरी में 2210वीं रैंक
यह सिर्फ एक रैंक नहीं थी, बल्कि सालों की मेहनत, दर्द और संघर्ष का परिणाम था।
प्रेरणा जो हर किसी के लिए है
अभिषेक कुल्हरी की कहानी यह साबित करती है कि जीवन की कठिनाइयाँ इंसान को रोकने के लिए नहीं, बल्कि मजबूत बनाने के लिए आती हैं।
अंधेरे ने उनकी दृष्टि छीनी, लेकिन सपनों की रोशनी नहीं छीन सका।
क्योंकि कुछ लोग हालात के आगे झुकते नहीं…
वे अपने संघर्ष से नई कहानी लिखते हैं।
निष्कर्ष
अभिषेक की यह यात्रा हमें सिखाती है कि असली जीत परिस्थितियों पर नहीं, बल्कि खुद पर भरोसे की होती है।
जब इरादे मजबूत हों, तो अंधेरा भी रास्ता दिखा देता है।