इजरायल ने PM मोदी के दौरे को बनाया ‘रणनीतिक कवर’? ईरान हमले से पहले बड़े खेल का खुलासा
अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इजरायल और अमेरिका ने ईरान पर हमले की योजना पहले ही बना ली थी और पीएम मोदी के दौरे के दौरान कूटनीतिक माहौल का इस्तेमाल रणनीतिक कवर के रूप में किया गया। टाइमिंग, जिनेवा बातचीत और हमले की देरी को लेकर अब बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं।
तेल अवीव/वॉशिंगटन: ईरान पर हालिया हमले की टाइमिंग को लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नए सवाल खड़े हो गए हैं। अमेरिकी वेबसाइट Axios की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि United States और Israel ने ईरान पर सैन्य कार्रवाई की योजना पहले ही बना ली थी, लेकिन ऑपरेशनल कारणों से इसे एक सप्ताह टाल दिया गया।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इसी दौरान भारत के प्रधानमंत्री Narendra Modi का इजरायल दौरा प्रस्तावित था। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या इस कूटनीतिक गतिविधि ने दुनिया को यह संकेत देने में भूमिका निभाई कि फिलहाल कोई हमला नहीं होने वाला है।
एक हफ्ते की देरी क्यों?
सूत्रों के मुताबिक, 17 फरवरी को अमेरिकी और ईरानी अधिकारियों के बीच बातचीत बेनतीजा रही। इसके बाद 21 फरवरी को हमले की संभावित तारीख तय की गई थी। हालांकि, बाद में इसे टाल दिया गया।
कुछ अधिकारियों ने खराब मौसम और सैन्य समन्वय को वजह बताया, जबकि अन्य सूत्रों के अनुसार रणनीतिक कारण अधिक अहम थे।
जिनेवा में बातचीत – आखिरी मौका या रणनीति?
हमले से पहले जिनेवा में एक और दौर की वार्ता आयोजित की गई। इस दौरान अमेरिका की ओर से 10 साल तक यूरेनियम संवर्धन (एनरिचमेंट) रोकने का प्रस्ताव रखा गया और नागरिक जरूरतों के लिए परमाणु ईंधन उपलब्ध कराने की पेशकश की गई।
हालांकि, ईरान ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।
क्या ‘नो अटैक’ का संदेश दिया गया?
रिपोर्ट के अनुसार, कुछ इजरायली खुफिया अधिकारियों का मानना था कि दुनिया को यह भरोसा दिलाना जरूरी था कि हमला तत्काल नहीं होगा। माना जा रहा था कि यदि ईरान के सुप्रीम लीडर Ali Khamenei को खतरे का आभास होता, तो वे सुरक्षित बंकर में चले जाते, जिससे ऑपरेशन प्रभावित हो सकता था।
ट्रंप प्रशासन की भूमिका
उस समय अमेरिकी नेतृत्व के भीतर भी दो विकल्पों—डिप्लोमेसी और सैन्य कार्रवाई—पर चर्चा चल रही थी। Donald Trump प्रशासन के अधिकारियों का कहना था कि अगर वार्ता में गंभीरता दिखती, तो कार्रवाई और टल सकती थी।
उठते सवाल
पूरे घटनाक्रम ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं—
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क्या कूटनीतिक दौरों की टाइमिंग महज संयोग थी?
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क्या बातचीत असली थी या रणनीतिक दबाव बनाने का तरीका?
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और क्या हमले की देरी केवल मौसम और सैन्य तैयारी के कारण थी?
हालांकि, अमेरिका और इजरायल की ओर से किसी भी ‘कूटनीतिक कवर’ की थ्योरी को आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं किया गया है। लेकिन रिपोर्ट सामने आने के बाद वैश्विक राजनीति में इस घटनाक्रम पर बहस तेज हो गई है।
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच यह मामला आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और सुरक्षा समीकरणों पर गहरा असर डाल सकता है।
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