35 किमी/घंटे से शुरू हुआ सफर… 152 साल बाद ऐसी बदल गई इस ‘रेल नगरी’ की तस्वीर कि जानकर रह जाएंगे हैरान!

35 किमी/घंटे से शुरू हुआ सफर आज हाईस्पीड तक—152 साल में कैसे बदली पूरी तस्वीर, जानिए।

Apr 20, 2026 - 13:29
35 किमी/घंटे से शुरू हुआ सफर… 152 साल बाद ऐसी बदल गई इस ‘रेल नगरी’ की तस्वीर कि जानकर रह जाएंगे हैरान!

राजस्थान की धरती पर जब पहली बार रेल की सीटी गूंजी थी, तब किसी ने नहीं सोचा होगा कि 35 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से शुरू हुआ यह सफर एक दिन 130 से 160 किमी/घंटे की रफ्तार तक पहुंच जाएगा। रेल नगरी बांदीकुई आज अपने 152 साल के ऐतिहासिक पड़ाव पर खड़ी है, जहां अतीत की छुक-छुक और वर्तमान की रफ्तार एक साथ नजर आती है।

शुरुआत: जब पहली बार दौड़ी ट्रेन

20 अप्रैल 1874 का दिन राजस्थान के इतिहास में खास बन गया, जब आगरा से बांदीकुई के बीच पहली मीटर गेज ट्रेन चलाई गई। शुरुआती दौर में इस ट्रेन की गति महज 35 से 40 किमी/घंटे थी। बाद में इस लाइन को दौसा तक बढ़ाया गया और धीरे-धीरे बांदीकुई एक महत्वपूर्ण रेलवे जंक्शन बनकर उभरा। दिल्ली, जयपुर और आगरा के बीच इसकी रणनीतिक स्थिति ने इसे देश का पहला मीटर गेज जंक्शन बना दिया।

तकनीक और ढांचे में बड़ा बदलाव

समय के साथ रेलवे ने कई बड़े बदलाव देखे।

वर्ष 1994 में दिल्ली-जयपुर रेलमार्ग का आमान परिवर्तन (मीटर गेज से ब्रॉड गेज) किया गया, जिससे ट्रेनों की क्षमता और गति दोनों बढ़ी।

इसके बाद 2004 में बांदीकुई-आगरा रेलखंड को भी ब्रॉड गेज में बदला गया।

2021 में दिल्ली-जयपुर रूट का विद्युतीकरण हुआ, जिससे ट्रेनों की रफ्तार और संचालन और अधिक आधुनिक हो गया।

हालांकि इन बदलावों के साथ कुछ पुरानी पहचान भी खत्म हुई, जैसे बांदीकुई का लोको शेड हटना—जो कभी इस जंक्शन की पहचान हुआ करता था।

रफ्तार का सफर: 35 से 130+ तक

जहां कभी ट्रेनें 35-40 किमी/घंटे की रफ्तार से चलती थीं, वहीं अब जयपुर-दिल्ली मार्ग पर ट्रेनें 130 किमी/घंटे की स्पीड से दौड़ रही हैं।

भविष्य में इस रफ्तार को 160 किमी/घंटे तक ले जाने की योजना है, जिससे वंदे भारत जैसी सेमी हाईस्पीड ट्रेनें और तेज़ी से इस मार्ग पर दौड़ सकेंगी।

वहीं आगरा-बांदीकुई मार्ग पर फिलहाल अधिकतम गति 110 किमी/घंटे है।

आधुनिक विकास और नई पहचान

150.51 किलोमीटर लंबे बांदीकुई-आगरा रेलखंड पर करीब 1338 करोड़ रुपये की लागत से दोहरीकरण का कार्य जारी है, जिसे दिसंबर 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।

इसके अलावा अमृत भारत योजना के तहत करीब 25 करोड़ रुपये से स्टेशन का पुनर्विकास किया जा रहा है, जो अब अंतिम चरण में है।

नए स्टेशन में यात्रियों के लिए कई आधुनिक सुविधाएं विकसित की गई हैं—

12 मीटर चौड़ा फुटओवर ब्रिज

एसी वेटिंग हॉल

आकर्षक पेंटिंग्स

पार्किंग सुविधा

बेहतर लाइटिंग और सर्कुलेटिंग एरिया

ब्रिटिशकालीन पुराने भवन की जगह अब आधुनिक स्टेशन ने ले ली है।

इतिहास की अनोखी झलक

एक समय था जब स्टेशन पर लगी ब्रिटिशकालीन घंटी ही ट्रेनों के संचालन का मुख्य संकेत हुआ करती थी। घंटी की आवाज और उसकी संख्या से ही रेलकर्मी और यात्री ट्रेन के आगमन का अंदाजा लगा लेते थे।

आज उसी जगह डिजिटल अनाउंसमेंट सिस्टम और आधुनिक तकनीक ने ले ली है।

विरासत को सहेजने की पहल

रेलवे अपनी विरासत को संजोने के लिए भी कदम उठा रहा है।

24 फरवरी 2026 को तिरुचिरापल्ली की गोल्डन रॉक वर्कशॉप से एक स्टीम इंजन बांदीकुई लाया गया है, जिसे स्टेशन के बाहर प्रदर्शित किया जाएगा। इसका उद्देश्य नई पीढ़ी को रेलवे के गौरवशाली इतिहास से जोड़ना है।

दिलचस्प तथ्य

विशेषज्ञों के अनुसार, स्टीम इंजन के लिए पानी की गुणवत्ता बेहद महत्वपूर्ण होती थी। अंग्रेजों ने बांदीकुई के पानी के सैंपल लंदन तक जांच के लिए भेजे थे। रिपोर्ट पास होने के बाद ही यहां ट्रेन संचालन शुरू करने का फैसला लिया गया था।

बांदीकुई पहुंचने वाली पहली ट्रेन ‘डब’ नामक इंजन से चलाई गई थी।

समय के साथ बदलाव (Timeline):

1874: आगरा-बांदीकुई के बीच पहली ट्रेन

1994: दिल्ली-जयपुर मार्ग ब्रॉड गेज

2004: बांदीकुई-आगरा ब्रॉड गेज

2021: दिल्ली-जयपुर मार्ग विद्युतीकरण

2026: दोहरीकरण कार्य का लक्ष्य

 निष्कर्ष:

बांदीकुई सिर्फ एक रेलवे स्टेशन नहीं, बल्कि राजस्थान के रेल इतिहास की जीवंत कहानी है—जहां 35 किमी/घंटे की धीमी शुरुआत आज हाईस्पीड और अत्याधुनिक सुविधाओं में बदल चुकी है। अतीत की विरासत और भविष्य की रफ्तार—दोनों का संगम ही बांदीकुई को ‘रेल नगरी’ की पहचान देता है।

Kashish Sain Bringing truth from the ground