पानी की किल्लत से भड़की महंगाई की आग: सूखते खेत और सिकुड़ती जेब, 'विकसित भारत' के सफर पर मंडराया खतरा

कमजोर मॉनसून और गहराते जल संकट से भारत की खाद्य सुरक्षा और औद्योगिक विकास पर ब्रेक लगने का खतरा है। जानिए इससे आम आदमी की जेब और अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा।

yashaswani
yashaswani Verified Public Figure • 17 Aug, 2026 Sub Editor
November 3, 2026 • 7:09 PM  9
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राजस्थान
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पानी की किल्लत से भड़की महंगाई की आग: सूखते खेत और सिकुड़ती जेब, 'विकसित भारत' के सफर पर मंडराया खतरा
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पानी की किल्लत से भड़की महंगाई की आग: सूखते खेत और सिकुड़ती जेब, 'विकसित भारत' के सफर पर मंडराया खतरा

भारत वर्तमान में दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है और 'विकसित भारत 2047' के लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन, लगातार गिरता भूजल स्तर और कमजोर मॉनसून इस आर्थिक सफर में एक बड़ी रुकावट बनकर उभरे हैं। पानी की किल्लत अब केवल पर्यावरण का विषय न होकर सीधे तौर पर देश के औद्योगिक विकास और आम आदमी की रसोई के बजट से जुड़ गई है।

कृषि पर सीधा असर और भड़कती महंगाई

बारिश कम होने से खेतों की नमी घट गई है, जिसका बड़ा असर सर्दियों की रबी फसलों (जैसे गेहूं और चना) की बुवाई पर पड़ रहा है। उदाहरण के तौर पर, महाराष्ट्र के जालना जिले में औसत से 48 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष बी.वी. कृष्णा राव के मुताबिक, सूखे मौसम के कारण दक्षिण भारत में चावल की पसंदीदा किस्मों की सप्लाई घटी है और कीमतें बढ़ गई हैं। चीनी, दाल, चावल और सब्जियों के दाम बढ़ने से खाद्य महंगाई का ग्राफ लगातार ऊपर जा रहा है।

उद्योगों और नए ड्रीम प्रोजेक्ट्स पर मंडराता संकट

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) की रिपोर्ट बताती है कि 18 फीसदी वैश्विक आबादी वाले भारत के पास दुनिया के स्वच्छ जल संसाधनों का मात्र 4 फीसदी हिस्सा है। स्टील, केमिकल और टेक्सटाइल जैसे पारंपरिक उद्योगों के साथ-साथ सेमीकंडक्टर, फार्मास्यूटिकल्स और डेटा सेंटर्स जैसे आधुनिक ड्रीम प्रोजेक्ट्स पूरी तरह से पानी पर निर्भर हैं।

आईआईटी मद्रास के प्रोफेसर लिगी फिलिप के अनुसार, चुनौती सिर्फ मांग और आपूर्ति के बीच असंतुलन की नहीं है, बल्कि जल स्रोतों की गुणवत्ता और विश्वसनीयता की भी है। वहीं, केपीएमजी इंडिया के पार्टनर सुमुलेंद्र घोष का मानना है कि पानी औद्योगिक ग्रोथ को पूरी तरह तो नहीं रोकेगा, लेकिन यह जरूर तय करेगा कि भविष्य में कौन से इंडस्ट्रियल क्लस्टर आगे बढ़ेंगे।

नीति आयोग की चेतावनी और भविष्य का समाधान

नीति आयोग के आंकड़ों के अनुसार, 2030 तक पानी की मांग मौजूदा सप्लाई से दोगुनी होने का अनुमान है, जिससे जीडीपी को 6% तक का नुकसान हो सकता है। पानी की कमी के कारण थर्मल पावर प्लांट पहले भी ठप पड़ चुके हैं।

एक्सपर्ट्स का स्पष्ट कहना है कि अब सिर्फ नए स्रोत खोजना पर्याप्त नहीं है। भारत के शहरों से रोजाना करीब 72.36 करोड़ लीटर (MLD) सीवेज निकलता है, लेकिन इसमें से सिर्फ 20.23 करोड़ लीटर का ही ट्रीटमेंट हो पाता है। अगर इस ट्रीटेड पानी का इस्तेमाल उद्योगों, डेटा सेंटर्स और पावर प्लांट्स में अनिवार्य कर दिया जाए, तो पीने वाले साफ पानी की किल्लत काफी हद तक कम हो सकती है। बेहतर पॉलिसी, सीवेज रीसाइक्लिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और भूजल के दोहन पर रोक ही भारत की अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रख सकते हैं।

yashaswani Verified Public Figure • 17 Aug, 2026 Sub Editor

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