102° बुखार, 3 दिन भूखे पिता और रिंग में गोल्ड... कोटा की बेटी ने कैसे रचा इतिहास?

102 डिग्री बुखार के बावजूद कोटा की 23 साल की बॉक्सर अरुंधति चौधरी ने कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रच दिया। पिता की सलाह पर बास्केटबॉल छोड़ बॉक्सिंग में उतरीं अरुंधति की जीत के लिए उनके पिता ने 3 दिन का उपवास रखा था। रिंग में तिरंगा फहराने के बाद अब उनका अगला सपना ओलंपिक में देश को गोल्ड दिलाना है।

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TEAM KHATAK Verified Media or Organization • 11 Jun, 2026 Editor
August 2, 2026 • 3:19 PM  46
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राजस्थान
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102° बुखार, 3 दिन भूखे पिता और रिंग में गोल्ड... कोटा की बेटी ने कैसे रचा इतिहास?
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102° बुखार, 3 दिन भूखे पिता और रिंग में गोल्ड... कोटा की बेटी ने कैसे रचा इतिहास?

कोटा: जब शरीर 102 डिग्री तेज बुखार से तप रहा हो, हाथ-पैर में जान न बची हो और डॉक्टर सिर्फ आराम करने की सलाह दे रहे हों—तब कोई आम इंसान बिस्तर से उठने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाता। लेकिन जब सीने में देश के लिए तिरंगा फहराने का जुनून हो, तो फिर बुखार भी घुटने टेकने पर मजबूर हो जाता है। राजस्थान के कोटा की 23 साल की बेटी अरुंधति चौधरी ने कॉमनवेल्थ गेम्स की मुक्केबाजी रिंग में कुछ ऐसा ही कारनामा कर दिखाया है। रिंग में विरोधी के पंच बरसते रहे, अरुंधति का शरीर बुखार से तपता रहा, लेकिन उनके कदम एक पल के लिए भी नहीं डगमगाए। नतीजा यह हुआ कि पूरे देश का सिर गर्व से ऊंचा हो गया और भारत की झोली में चमचमाता गोल्ड मेडल आ गिरा।

बहुत कम लोग जानते हैं कि आज रिंग में तहलका मचाने वाली अरुंधति 15 साल की उम्र तक बास्केटबॉल की बेहतरीन खिलाड़ी हुआ करती थीं। एक दिन उनके पिता सुरेश चौधरी ने बेटी के मिजाज और गजब के स्टैमिना को देखकर प्यार से कहा कि उनका असली मुकाम बास्केटबॉल कोर्ट नहीं बल्कि बॉक्सिंग रिंग है। पिता की यह बात अरुंधति के दिल में ऐसी उतरी कि उन्होंने बास्केटबॉल का पाला छोड़कर हाथों में ग्लव्स पहन लिए। पिता ने बेटी का नाम 'अरुंधति' यानी सूरज की पहली किरण रखा था, और आज उस बेटी ने सचमुच अपनी चमक से पूरी दुनिया को रोशन कर दिया है।

फाइनल मुकाबले से ठीक पहले जब अरुंधति को 102 डिग्री बुखार आया, तो कोटा में बैठा पूरा परिवार सन्न रह गया। मां और बहन की सांसें अटक गईं, लेकिन मैदान छोड़ने का तो सवाल ही नहीं था क्योंकि मुकाबला सीधे देश के लिए सोने के तमगे का था। बेटी की इस जिद को देखकर पिता सुरेश चौधरी श्रीनाथजी मंदिर पहुंचे और संकल्प लिया कि जब तक बेटी रिंग में उतरकर जीत नहीं जाती, वे अन्न का एक दाना भी ग्रहण नहीं करेंगे। वे तीन दिनों तक भूखे पेट मंदिर में बैठकर प्रार्थना करते रहे। उधर भाई शिवराज सेमीफाइनल के बाद तुरंत उज्जैन जाकर महाकाल के दरबार में अर्जी लगा आए और घर पर अखंड जोत जलती रही।

जैसे ही रिंग में रेफरी ने अरुंधति का हाथ हवा में उठाकर उन्हें विजेता घोषित किया, कोटा स्थित उनके घर में ढोल-नगाड़ों और पटाखों की गूंज सुनाई देने लगी। तीन दिन से भूखे पेट मंदिर में बैठे पिता और घर पर बीमार मां ने जब वीडियो कॉल पर एक-दूसरे का चेहरा देखा, तो दोनों की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। पोडियम पर जब राष्ट्रगान की धुन बजी और भारत का तिरंगा सबसे ऊपर लहराया, तो अरुंधति का सालों पुराना सपना सच हो गया।

कॉमनवेल्थ में इतिहास रचने के बाद अब यह 'गोल्डन गर्ल' अपने घर लौटने और परिवार के साथ पसंदीदा खाना खाने को बेताब है। लेकिन असली रोमांच तो अब शुरू होता है। कॉमनवेल्थ का मैदान फतह करने के बाद अरुंधति की नजरें अब दुनिया के सबसे बड़े खेल मंच यानी ओलंपिक पर टिक गई हैं। क्या 102 डिग्री बुखार में भी विरोधी को धूल चटाने वाली कोटा की यह धाकड़ बॉक्सर ओलंपिक की रिंग में भी इतिहास दोहरा पाएगी? क्या अरुंधति का यह पंच भारत को ओलंपिक बॉक्सिंग का पहला गोल्ड दिला पाएगा? इस सवाल का जवाब भले ही आने वाला वक्त देगा, लेकिन अरुंधति ने देश की करोड़ों बेटियों को यह बता दिया है कि अगर इरादों में दम हो, तो कोई भी रुकावट आपको आपकी मंजिल तक पहुंचने से नहीं रोक सकती।

TEAM KHATAK Verified Media or Organization • 11 Jun, 2026 Editor

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