पाकिस्तान ने रखा था 2 लाख का इनाम, वो अब भारत में बन गया नेता

1971 के भारत-पाक युद्ध में भारतीय सेना की मदद करने वाले 77 वर्षीय पदमसिंह सोढ़ा बाड़मेर के नवगठित छाछरो गांव के सरपंच चुने गए हैं। पाकिस्तान ने उन पर इनाम रखा था।

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yashaswani Verified Public Figure • 17 Aug, 2026 Sub Editor
October 26, 2026 • 3:29 PM  2.7k
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राजस्थान
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पाकिस्तान ने रखा था 2 लाख का इनाम, वो अब भारत में बन गया नेता
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26 Oct 2026
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पाकिस्तान ने रखा था 2 लाख का इनाम, वो अब भारत में बन गया नेता

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में अदम्य साहस दिखाते हुए पाकिस्तानी सीमा के भीतर अपनी पुश्तैनी हवेली पर तिरंगा फहराने वाले 77 वर्षीय पदमसिंह सोढ़ा अब राजस्थान के बाड़मेर जिले में सरपंच चुने गए हैं। पदमसिंह बाड़मेर के नवगठित राजस्व गांव 'छाछरो' के सरपंच बने हैं। यह नाम न केवल उनकी पुरानी पहचान से जुड़ा है, बल्कि भारतीय सेना के उस ऐतिहासिक शौर्य को भी सलाम करता है जब सेना ने पाकिस्तान के भीतर घुसकर बड़े इलाके पर कब्जा कर लिया था।

338 वोटों के अंतर से मिली शानदार जीत

हाल ही में 24 अक्टूबर को हुए पंचायत चुनावों में छाछरो गांव के लोगों ने पदमसिंह को अपना नेता चुना। इस चुनाव में पदमसिंह को 950 वोट मिले, जबकि उनके करीबी प्रतिद्वंद्वी धनाराम को 612 वोट प्राप्त हुए। इस तरह पदमसिंह ने 338 वोटों के स्पष्ट अंतर से जीत दर्ज की। करीब 55 साल पहले पाकिस्तान छोड़कर भारत में बसने वाले पदमसिंह के लिए यह जीत बेहद भावुक और ऐतिहासिक है।

पाकिस्तान ने घोषित किया था 2-2 लाख का इनाम

पदमसिंह मूल रूप से पाकिस्तान के सिंध प्रांत के थारपारकर जिले में स्थित छाछरो गांव के ठाकुर थे। उनके बड़े भाई लक्ष्मण सिंह सोढ़ा पाकिस्तान के पूर्व रेलमंत्री रहे थे। 1971 के युद्ध के दौरान पदमसिंह और उनके परिवार ने मातृभूमि के प्रति प्रेम दिखाते हुए भारतीय सेना का पूरा साथ दिया। थार मरुस्थल के रास्तों और धोरों की गहरी जानकारी होने के कारण पदमसिंह, उनके भाई लक्ष्मण सिंह और लोकनायक ठाकुर बलवंत सिंह बाखासर ने भारतीय सेना का मार्गदर्शन किया।

इस मदद से बौखलाए पाकिस्तान ने पदमसिंह और लक्ष्मण सिंह पर जासूसी का आरोप लगाते हुए दोनों भाइयों पर 2-2 लाख रुपये का इनाम घोषित कर दिया था। युद्ध के दौरान ही पदमसिंह ने अपनी हवेली पर भारत का तिरंगा फहरा दिया और फिर अपनी पुश्तैनी जमीन और हवेली छोड़कर हमेशा के लिए परिवार सहित भारत आ गए।

लेफ्टिनेंट कर्नल भवानी सिंह के नेतृत्व में हुआ था 'ऑपरेशन छाछरो'

1971 के युद्ध में भारतीय सेना की 10 पैरा स्पेशल फोर्सेज (10 Para SF) ने 5 से 10 दिसंबर के बीच छाछरो और उसके आसपास सैन्य अभियान चलाया था। इस अभियान का नेतृत्व जयपुर के पूर्व महाराजा और तत्कालीन लेफ्टिनेंट कर्नल सवाई भवानी सिंह (बाद में ब्रिगेडियर) ने किया था। 6 दिसंबर 1971 को ब्रिगेडियर भवानी सिंह के साथ पाकिस्तान की ओर गए सिविल दस्ते में पदमसिंह भी शामिल थे।

भारतीय सेना की आर्मर और इन्फैंट्री टुकड़ियां सीमा पार कर पाकिस्तान में 80 से 100 किलोमीटर तक अंदर घुस गई थीं। मात्र सात दिन के भीतर सेना ने छाछरो कस्बे पर कब्जा कर लिया और पाकिस्तानी सेना को भारी नुकसान पहुंचाया। यह कस्बा करीब आठ महीने तक भारतीय सेना के नियंत्रण में रहा। बाद में 1972 के शिमला समझौते के तहत इसे पाकिस्तान को वापस सौंप दिया गया। इस अदम्य साहस के लिए लेफ्टिनेंट कर्नल भवानी सिंह को 'महावीर चक्र' से सम्मानित किया गया और 10 पैरा (SF) को 'छाछरो 1971' का युद्ध सम्मान मिला।

दो देशों में बंटे दो छाछरो, फासला सिर्फ 1 किलोमीटर

भारत आने के बाद पदमसिंह का परिवार पहले चौहटन पहुंचा और फिर बावड़ी कलां में बस गया। उनके भाई लक्ष्मण सिंह बाद में चौहटन के प्रधान भी बने। पदमसिंह ने अपने पुराने गांव की यादें हमेशा संजोए रखीं और खुद को 'पदमसिंह छाछरो' ही कहलाना पसंद किया।

करीब डेढ़ साल पहले राजस्थान में परिसीमन के दौरान बावड़ी कलां से अलग कर एक नया राजस्व गांव बनाया गया। 1971 के ऐतिहासिक युद्ध और विस्थापित परिवारों की पुरानी पहचान को सम्मान देने के लिए इस नए गांव का नाम भी 'छाछरो' रखा गया। आज पाकिस्तान का छाछरो (सिंध) और भारत का छाछरो (बाड़मेर) दोनों सीमाओं के आर-पार स्थित हैं और इनके बीच महज 1 किलोमीटर की दूरी बताई जाती है। जिस गांव का नाम उनकी पहचान था, उसी गांव का सरपंच बनकर पदमसिंह ने इतिहास का एक चक्र पूरा कर लिया है।

yashaswani Verified Public Figure • 17 Aug, 2026 Sub Editor

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