देशभर में जहां कई बार जाति और धर्म के नाम पर दूरियां देखने को मिलती हैं, वहीं राजस्थान के झुंझुनूं जिले की इस्लामपुर ग्राम पंचायत आपसी भाईचारे की एक शानदार कहानी लिख रही है। करीब 8400 मतदाताओं वाली इस पंचायत में पिछले 37 वर्षों से एक बेहद खास परंपरा लागू है—अगर सरपंच हिंदू समुदाय से बनता है, तो उपसरपंच मुस्लिम समुदाय से चुना जाता है और यदि सरपंच मुस्लिम बनता है, तो उपसरपंच हिंदू समुदाय का होता है।
इस बार अलका सैनी बनीं सरपंच, तो परबीना बानो को चुना गया उपसरपंच
हाल ही में हुए चुनावों में भी इस सांप्रदायिक सौहार्द को टूटने नहीं दिया गया। ग्राम पंचायत में अलका सैनी सरपंच चुनी गईं। उपसरपंच के चुनाव के दौरान शुरुआत में सर्वसम्मति नहीं बन पा रही थी, लेकिन गांव के समझदार लोगों ने एकजुट होकर पंचों को समझाया। इसके बाद मतदान प्रक्रिया के जरिए परबीना बानो के पक्ष में वोट करवाकर उन्हें उपसरपंच पद पर काबिज किया गया। ग्रामीणों की इसी समझदारी से भाईचारे की यह पुरानी परिपाटी एक बार फिर बरकरार रही।
1988 से अनवरत जारी है यह अनोखा सिलसिला
सर्वसमाज की सहमति से चलने वाली यह परंपरा 1988 से बिना रुके चली आ रही है। आइए एक नजर डालते हैं इस पंचायत के ऐतिहासिक तालमेल पर:
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1988: याकूब पठान (सरपंच) – भगवानाराम स्वामी (उपसरपंच)
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1995: दलीप गर्वा (सरपंच) – सदीक चौहान/बरकत अली (उपसरपंच)
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2000: बरकत अली (सरपंच) – शीशराम सैनी (उपसरपंच)
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2005: राकेश देवी (सरपंच) – आमीन मनियार (उपसरपंच)
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2010: रशीदा बानो (सरपंच) – चंदा सोनी (उपसरपंच)
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2015: आशाराम गर्वा (सरपंच) – मकबूल कुरैशी (उपसरपंच)
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2020: आमीन मनियार (सरपंच) – रविंद्र गर्वा (उपसरपंच)
इस्लामपुर के लोगों का यह आपसी प्रेम और सद्भाव आज आसपास की दर्जनों ग्राम पंचायतों के लिए चर्चा का विषय और एक बड़ी नजीर बन चुका है। यह पंचायत साबित करती है कि समाज की असली मजबूती आपसी एकता में ही निहित है।