न्यायपालिका की निष्पक्षता और जवाबदेही को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम मामले की सुनवाई की है। मामला उत्तर प्रदेश के कैराना (शामली) में POCSO कोर्ट की जिम्मेदारी संभाल रहे अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (ADJ) अशोक भरतेंदु से जुड़ा है। जज भरतेंदु पर दिल्ली में रेप का मुकदमा दर्ज है। शिकायतकर्ता महिला ने उन्हें POCSO कोर्ट जैसे संवेदनशील पद से हटाने की मांग की है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने सीधे दखल देने के बजाय इलाहाबाद हाई कोर्ट से विजिलेंस जांच की स्टेटस रिपोर्ट तलब की है।
क्या है पूरा मामला?
जज अशोक भरतेंदु के खिलाफ 8 दिसंबर 2022 को दिल्ली के मयूर विहार फेज-1 थाने में IPC की धारा 376 के तहत FIR दर्ज हुई थी। उन पर शादी का झांसा देकर यौन संबंध बनाने का आरोप है। दिल्ली की कड़कड़डूमा अदालत इस मामले में चार्जशीट पर संज्ञान ले चुकी है। महिला का तर्क है कि जिस न्यायिक अधिकारी पर खुद इतना गंभीर आपराधिक केस चल रहा हो, उसे बच्चों से जुड़े POCSO मामलों की सुनवाई नहीं करनी चाहिए।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने खारिज की थी याचिका
इससे पहले महिला ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में रिट याचिका दाखिल कर जज को पद से हटाने की मांग की थी। 17 अगस्त 2026 को हाई कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति एक प्रशासनिक फैसला है और महिला जज के कामकाज से जुड़ी कोई ठोस खामी नहीं बता पाई है। इसके बाद महिला ने RTI के जरिए विजिलेंस जांच की जानकारी मांगी, लेकिन उसे भी खारिज कर दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुई चर्चा?
2 नवंबर 2026 को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। महिला के वकील ने साफ किया कि वे जज को निलंबित करने की नहीं, बल्कि सिर्फ POCSO कोर्ट से हटाने की मांग कर रहे हैं। इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि अदालत को शिकायतकर्ता और आरोपी के कानूनी अधिकारों के बीच संतुलन बनाना होगा।
आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल जज को उनके पद से हटाने का कोई सीधा आदेश नहीं दिया है। अदालत ने इस प्रशासनिक फैसले को इलाहाबाद हाई कोर्ट पर छोड़ दिया है, लेकिन लंबित विजिलेंस जांच पर जवाब जरूर मांगा है। मामले की अगली सुनवाई दिसंबर 2026 में होगी।