राजस्थान के शेखावाटी अंचल का मशहूर 'बाजरे का चूरमा' अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी महक बिखेरने को तैयार है। केंद्र सरकार की 'एक जिला-एक उत्पाद' (ODOP) योजना के तहत सीकर जिले की मुख्य पहचान के तौर पर इस पारंपरिक व्यंजन को चुना गया है। इस फैसले के बाद राज्य सरकार वैश्विक स्तर पर चूरमे की ब्रांडिंग और प्रचार-प्रसार करेगी। इससे ना सिर्फ स्थानीय अर्थव्यवस्था और रसोइयों को फायदा मिलेगा, बल्कि देशी-विदेशी पर्यटकों को भी शेखावाटी के असली स्वाद का अनुभव मिलेगा।
युद्ध परंपराओं से जुड़ा है चूरमे का इतिहास
बाजरे के चूरमे का प्रचलन सिर्फ स्वाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा नाता प्राचीन काल की युद्ध परंपराओं से रहा है। कम बारिश वाले मरुस्थलीय इलाकों में बाजरा बहुतायत में होता है। पुराने समय में सैनिक और लंबी यात्रा करने वाले राहगीर बाजरे की सोगरी को भूनकर, उसमें शुद्ध देसी घी और गुड़ मिलाकर चूरमा तैयार करते थे। घी और गुड़ के इस खास मिश्रण के कारण यह महीनों तक खराब नहीं होता था। आज भी शेखावाटी के हर घर में मांगलिक कार्यों और धार्मिक त्योहारों पर इसे बड़े चाव से बनाया जाता है।
सीकर के इन उत्पादों को भी मिल चुकी है पहचान
बाजरे के चूरमे को जिले का प्रमुख व्यंजन घोषित करने से पहले भी सीकर के कई उत्पादों को 'पंच गौरव' और ODOP योजना में जगह मिल चुकी है:
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कृषि उत्पाद: सीकर का प्याज
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विशेष प्रजाति: अमरूद
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हस्तशिल्प: लकड़ी का फर्नीचर
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धार्मिक पर्यटन: खाटूश्यामजी मंदिर
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खेल: बास्केटबॉल
झुंझुनूं के पेड़े और चूरू के लहसुन की बारी
सीकर के बाद अब शेखावाटी के पड़ोसी जिलों के उत्पादों को भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर उभारने की तैयारी तेज हो गई है। योजना के अगले चरण के लिए झुंझुनूं जिले के मशहूर और स्वादिष्ट 'पेड़ों' को चुना गया है। इसके अलावा चूरू जिले से विशिष्ट उत्पाद के तौर पर 'लहसुन' को चुने जाने की प्रबल संभावना है। पर्यटन विकास समिति की आगामी बैठक में चूरू के लहसुन पर अंतिम मुहर लग सकती है।