दोपहर की तपती गर्मी, जंगलों के बीच ऊबड़-खाबड़ रास्ते और दूर-दूर तक फैला सन्नाटा… इन्हीं मुश्किल रास्तों को पार करने के बाद एक ऐसी बच्ची से मुलाकात होती है, जिसकी जिंदगी दर्द, अकेलेपन और संघर्ष का दूसरा नाम बन चुकी है।
छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के एक दूरस्थ गांव में रहने वाली 14 वर्षीय जागेश्वरी एक बेहद दुर्लभ बीमारी ‘इकथियोसिस हिस्ट्रिक्स’ से पीड़ित है। इस बीमारी ने उसके पूरे शरीर की चमड़ी को पेड़ की छाल जैसा कठोर और फटा हुआ बना दिया है। हालत ऐसी है कि वह ठीक से चल नहीं पाती, हाथ-पैर सीधे नहीं कर पाती और लगातार दर्द में जिंदगी जी रही है।
तीन महीने की उम्र से शुरू हुई बीमारी
जागेश्वरी की मां सुबी बताती हैं कि बेटी के जन्म के कुछ महीने बाद ही उसके पैरों की चमड़ी पर छोटे-छोटे कांटे जैसे उभार दिखाई देने लगे थे। परिवार अशिक्षित था, इसलिए शुरुआत में उन्हें लगा कि किसी तंत्र-मंत्र या बुरी नजर का असर है। उन्होंने झाड़-फूंक करवाई, ओझाओं को दिखाया, देवी को बलि भी चढ़ाई, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। धीरे-धीरे बीमारी बढ़ती गई और जागेश्वरी के पूरे शरीर की चमड़ी मोटी, सख्त और कांटेदार हो गई।
गांव के बच्चे ‘भूत’ कहकर चिढ़ाते थे
जागेश्वरी की मां के मुताबिक, जब वह छोटी थी और घर से बाहर खेलने जाती थी, तो गांव के बच्चे उसे ‘भूत’ कहकर चिढ़ाते थे। लोगों की बातें और डरावनी नजरें उसके मन पर गहरा असर छोड़ गईं। आखिरकार उसने बाहर निकलना ही बंद कर दिया। परिवार ने उसे कभी स्कूल नहीं भेजा। मां कहती हैं कि उन्हें लगता था कि बाकी बच्चे और शिक्षक भी उसे स्वीकार नहीं करेंगे।
बीमारी के कारण चलना-फिरना तक मुश्किल
आज हालत यह है कि जागेश्वरी का पूरा शरीर सख्त परतों से ढक चुका है। चेहरा, हथेलियां और पैरों के तलवे छोड़कर शरीर का लगभग हर हिस्सा प्रभावित है। चमड़ी इतनी सख्त हो चुकी है कि हाथ-पैर मोड़ने में भी दर्द होता है। जागेश्वरी गोंडी भाषा में बताती है कि शरीर में लगातार खिंचाव और जलन बनी रहती है। वह दीवार के सहारे मुश्किल से चल पाती है। कई बार दर्द इतना बढ़ जाता है कि उसे अपनी चमड़ी को खुरचकर निकाल देने का मन करता है।
गरीबी बनी सबसे बड़ी मजबूरी
परिवार बेहद गरीब है। घर जंगलों के बीच स्थित है और अस्पताल करीब 20 किलोमीटर दूर है। सड़कें खराब हैं, बारिश में गांव तक पहुंचना लगभग असंभव हो जाता है। सुबी बताती हैं कि जब बेटी की हालत ज्यादा बिगड़ी, तब कुछ रिश्तेदारों के कहने पर वे उसे गीदम अस्पताल लेकर गईं। वहां भी लोग उसकी हालत देखकर डर गए। डॉक्टरों को बीमारी समझ नहीं आई, इसलिए वे वापस लौट आए।
रायपुर मेडिकल कॉलेज में हुआ इलाज
साल 2019 में स्वास्थ्य शिविर के दौरान डॉक्टरों की नजर जागेश्वरी पर पड़ी। इसके बाद उसे रायपुर मेडिकल कॉलेज भेजा गया। वहां डर्मेटोलॉजी विभाग के डॉक्टरों ने उसका इलाज शुरू किया। रायपुर मेडिकल कॉलेज के डर्मेटोलॉजिस्ट विभागाध्यक्ष डॉ. मृत्युंजय सिंह बताते हैं कि यह उनके करियर के सबसे दुर्लभ मामलों में से एक था। जांच के लिए बायोप्सी और जेनेटिक टेस्ट मुंबई भेजे गए, जिसके बाद पता चला कि बच्ची ‘इकथियोसिस हिस्ट्रिक्स’ नाम की दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी से पीड़ित है।
क्या है ‘इकथियोसिस हिस्ट्रिक्स’?
यह एक बेहद दुर्लभ जेनेटिक स्किन डिजीज है, जिसमें त्वचा धीरे-धीरे मोटी, सख्त और फटी हुई हो जाती है। शरीर पर्याप्त मात्रा में केराटिन प्रोटीन नहीं बना पाता, जिससे त्वचा का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ जाता है।
इस बीमारी के प्रमुख लक्षण:
- त्वचा का मोटा और कठोर होना
- शरीर पर दरारें और घाव बनना
- हाथ-पैर मोड़ने में दर्द
- जोड़ों में अकड़न
- चलने-फिरने में परेशानी
- त्वचा में लगातार खिंचाव और जलन
बीमारी का स्थायी इलाज नहीं
डॉक्टरों के अनुसार इस बीमारी का कोई स्थायी इलाज नहीं है। इसे केवल दवाइयों, मॉइश्चराइजर, रेटिनॉयड्स और फिजियोथेरेपी की मदद से कंट्रोल किया जा सकता है। जब जागेश्वरी अस्पताल में भर्ती थी, तब उसकी हालत में सुधार हुआ था। लेकिन दवाइयां खत्म होने के बाद परिवार दोबारा इलाज जारी नहीं रख पाया। आर्थिक तंगी और अस्पताल की दूरी इसके पीछे बड़ी वजह रही।
पिता की कैंसर से मौत, मां अकेली संभाल रही परिवार
जागेश्वरी के पिता की साल 2021 में गले के कैंसर से मौत हो गई। अब मां अकेले चार बच्चों की जिम्मेदारी उठा रही हैं। उनमें सिर्फ जागेश्वरी ही इस बीमारी से पीड़ित है। सुबी कहती हैं कि जब तक वह जिंदा हैं, बेटी की देखभाल कर लेंगी, लेकिन उनके बाद उसका क्या होगा, यही सोचकर डर लगता है।
सरकार से मदद की उम्मीद
परिवार को अब तक केवल 13 हजार रुपए की आर्थिक सहायता मिली है। न तो विकलांगता प्रमाण पत्र बना है और न ही नियमित सरकारी सहायता मिल रही है। परिवार चाहता है कि सरकार बच्ची के इलाज, दवाइयों और जीवनयापन के लिए स्थायी मदद उपलब्ध कराए, ताकि जागेश्वरी को सामान्य जिंदगी जीने का थोड़ा सहारा मिल सके।